अध्याय 2 · ज्ञान का योग
सांख्य योग
वास्तविक उपदेश यहीं से। अविनाशी आत्मा, स्थिर बुद्धि, फल की कामना के बिना कर्म। 2.47 इसी अध्याय में है।
सभी 72 श्लोक नीचे।

श्लोक
- 2.1संजय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही…
- 2.2श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली…
- 2.3हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है । हे परंतप हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्…
- 2.4अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं ॥
- 2.5महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ । क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी क…
- 2.6हम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना इन दोनोंमेंसे कौनसा अत्यन्त श्रेष्ठ है और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें …
- 2.7कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कह…
- 2.8पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और शत्रुरहितराज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय…
- 2.9संजय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा साफसाफ कहकर चुप …
- 2.10हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश यह आगे कहे जानेवाले वचन बोले…
- 2.11श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण …
- 2.12किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है और इसके बाद भविष्य में मैं, तू और राजलोग हम सभी नहीं रहेंगे…
- 2.13देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है । उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं…
- 2.14हे कुन्तीनन्दन इन्द्रियोंके जो विषय जड पदार्थ हैं, वो तो शीत अनुकूलता और उष्ण प्रतिकूलता के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आनेजानेवाले…
- 2.15कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सुखदुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श पदार्थ व्यथित सुखीदुःखी नहीं कर पाते, वह अमर हो…
- 2.16टिप्पणी प0 55 असत् का तो भाव सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्…
- 2.17अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है । इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता ॥
- 2.18अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं । इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो ॥
- 2.19जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते क्योंकि यह न मारता है और न मारा …
- 2.20यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है । यह जन्मरहित, नित्यनिरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण अनादि …
- 2.21हे पृथानन्दन जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ॥
- 2.22मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है ॥
- 2.23शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती ॥
- 2.24यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता । कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें…
- 2.25यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है । अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये ॥
- 2.26हे महाबाहो अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये ॥
- 2.27क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा । इस जन्ममरणरूप परिवर्तन के प्रवाह का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता । …
- 2.28हे भारत सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं । अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या…
- 2.29कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको …
- 2.30हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है । इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नह…
- 2.31अपने स्वधर्म क्षात्रधर्म को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्यकर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके …
- 2.32अपनेआप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्गका दरवाजा भी है । हे पृथानन्दन वे क्षत्रिय बड़े सुखी भाग्यशाली हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता ह…
- 2.33अब अगर तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करेगा, तो अपने धर्म और कीर्तिका त्याग करके पापको प्राप्त होगा ॥
- 2.34और सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन अर्थात निंदा करेंगे । वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती ह…
- 2.35महारथीलोग तुझे भयके कारण युद्धसे उपरत हटा हुआ मानेंगे । जिनकी धारणामें तू बहुमान्य हो चुका है, उनकी दृष्टिमें तू लघुताको प्राप्त हो जायगा ॥
- 2.36तेरे शत्रुलोग तेरी सार्मथ्यकी निन्दा करते हुए न कहनेयोग्य बहुतसे वचन भी कहेंगे । उससे बढ़कर और दुःखकी बात क्या होगी ॥
- 2.37अगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा । अतः हे कुन्तीनन्दन तू युद…
- 2.38जयपराजय, लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ॥
- 2.39हे पार्थ यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर द…
- 2.40मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान जन्ममरणरूप महान् …
- 2.41हे कुरुनन्दन इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है । अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ह…
- 2.42हे पृथानन्दन जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंक…
- 2.43हे पृथानन्दन जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंक…
- 2.44उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी पर…
- 2.45वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं हे अर्जुन तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में …
- 2.46सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, व…
- 2.47कर्तव्यकर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं । अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ॥
- 2.48हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ॥
- 2.49बुद्धियोगसमता की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे अत्यन्त ही निकृष्ट है । अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि समता का आश्रय ले क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्…
- 2.50बुद्धिसमता से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है । अतः तू योगसमता में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंम…
- 2.51समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥
- 2.52जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा ॥
- 2.53जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा ॥
- 2.54अर्जुन बोले हे केशव परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता ह…
- 2.55श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपनेआपसे अपनेआपमें ही सन्तुष्ट रहता है…
- 2.56दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्व…
- 2.57सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उसउस शुभअशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ॥
- 2.58जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता हटा …
- 2.59निराहारी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता । परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका …
- 2.60हे कुन्तीनन्दन रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं ॥
- 2.61कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ॥
- 2.62विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है । क्रोध …
- 2.63विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है । क्रोध …
- 2.64वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्…
- 2.65वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्…
- 2.66जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भा…
- 2.67अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद…
- 2.68इसलिये हे महाबाहो जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत वशमें की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है ॥
- 2.69सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात परमात्मासे विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं…
- 2.70जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पू…
- 2.71जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है ॥
- 2.72हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है । इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता । इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण …