कबीर के दोहे, अर्थ सहित

पचास दोहे जो लोग सबसे ज़्यादा खोजते और भेजते हैं। किसी भी रेखांकित शब्द पर टैप करें, उसका अर्थ वहीं दिखेगा।

कबीर के सबसे मशहूर दोहे, जैसे "गुरु गोविंद दोऊ खड़े" और "बुरा जो देखन मैं चला", रामनरेश त्रिपाठी की कविता-कौमुदी (1917) में छपे मिलते हैं। यहाँ 50 दोहे हैं: हर एक का आसान हिंदी अर्थ, अंग्रेज़ी अर्थ, कठिन शब्दों के अर्थ, और यह कि दोहा किस संग्रह में मिलता है।

गुरु पर दोहे

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस पर सबसे ज़्यादा भेजे जाने वाले दोहे।

गुरु दोऊ खड़े लागू । गुरु आपने जिन दिया ॥

guru goviṁd doū khaṛe kāke lāgū pāṁybalihārī guru āpane jin goviṁd diyā batāy

गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम, क्योंकि उन्होंने ही भगवान तक पहुँचाया।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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गुरु कुम्हार है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै ।अन्तर हाथ सहार दै, बाहर चोट॥

guru kumhār siṣ kuṁbh hai, gaṛhi-gaṛhi kāṛhai khoṭantar hāth sahār dai, bāhar bāhai coṭ

गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा। भीतर हाथ से सहारा देता है, बाहर से चोट करके कमियाँ निकालता है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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गुरु बिन ज्ञान न , गुरु बिन मिलै न ।गुरु बिन न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष॥

guru bin jñān na upajai, guru bin milai na moṣguru bin lakhai na saty ko, guru bin miṭe na doṣ

गुरु बिना न ज्ञान आता है, न मुक्ति मिलती है, न सच दिखता है, न दोष मिटते हैं।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबीर साधु की ज्यों का ।जो कछु दे नहीं तो भी सुबास॥

kabīr saṁgat sādhu kī jyoṁ gaṁdhī kā bāsjo kachu gaṁdhī de nahīṁ to bhī bās subās

सज्जनों का साथ इत्र वाले की दुकान जैसा है। वह कुछ न भी दे, तो भी खुशबू मिल जाती है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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बोली और व्यवहार

कैसे बोलें, कैसे बरतें, और आलोचना को कैसे लें।

बुरा जो मैं चला बुरा न कोय।जो दिल आपना मुझसा बुरा न कोय॥

burā jo dekhan maiṁ calā burā na miliyā koyjo dil khojauṁ āpanā mujhasā burā na koy

मैं बुरा आदमी ढूँढने निकला, कोई न मिला। अपने भीतर झाँका तो मुझसे बुरा कोई नहीं था।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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ऐसी बोलिये मन का खोय। को करै आपहुँ होय॥

aisī bānī boliye man kā āpā khoyauran ko sītal karai āpahuṁ sītal hoy

ऐसी बात बोलो जिसमें अहंकार न हो। वह सुनने वाले को ठंडक दे और तुम्हें भी।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ । को छाया नहीं फल लागे दूर॥

baṛā huā to kyā huā jaise peṛ khajūrpaṁchī ko chāyā nahīṁ phal lāge ati dūr

खजूर के पेड़ जैसा बड़ा होने से क्या फ़ायदा। न पंछी को छाया, न फल किसी की पहुँच में।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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राखिये, आंगन छबाय।बिन पाणी बिन , निरमल करै ॥

niṁdak niyāre rākhiye, āṁgan kuṭi chabāybin pāṇī bin sabunā, niramal karai subhāy

आलोचक को पास रखो, आँगन में कुटिया बनाकर। वह बिना पानी-साबुन तुम्हारा स्वभाव साफ़ करता है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबहुँ न , जो पाँयन होय।कबहुँ उड़ आँखिन परे, होय॥

tinakā kabahuṁ na niṁdiye, jo pāṁyan tar hoykabahuṁ uṛ āṁkhin pare, pīr ghanerī hoy

पैरों के नीचे पड़े तिनके को भी छोटा मत समझो। उड़कर आँख में पड़े तो बहुत दर्द देता है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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जहाँ दया धर्म है जहाँ पाप।जहाँ क्रोध है जहाँ तहाँ ॥

jahāṁ dayā tah dharm hai jahāṁ lobh tah pāpjahāṁ krodh tah kāl hai jahāṁ chimā tahāṁ āp

जहाँ दया है वहाँ धर्म, जहाँ लालच वहाँ पाप। जहाँ गुस्सा वहाँ नाश, जहाँ माफ़ी वहाँ भगवान।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबिरा आप , और न कोय।आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥

kabirā āp ṭhagāie, aur na ṭhagie koyāp ṭhage sukh hot hai, aur ṭhage dukh hoy

खुद ठगे जाना ठीक, किसी को मत ठगो। खुद ठगे गए तो सुख मिलता है, दूसरे को ठगा तो दुख।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सबसे बड़ा, सब की खान।तीन लोक की , रही शील में आन॥

śīlavant sabase baṛā, sab ratanan kī khāntīn lok kī sampadā, rahī śīl meṁ ān

अच्छे स्वभाव वाला सबसे बड़ा है, वह सारे रत्नों की खान है। तीनों लोकों की दौलत शील में है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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जो काँटा , ताहि बोय तू फूल।तोकू फूल के फूल है, बाँकू है ॥

jo tokūṁ kāṁṭā buvai, tāhi boy tū phūltokū phūl ke phūl hai, bāṁkū hai tiraśūl

जो तुम्हारे लिए काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हें फूल मिलेंगे, उसे काँटे।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबहुँ न फल , नदी न नीर। के कारने, साधु धरा शरीर॥

birachā kabahuṁ na phal bhakhai, nadī na aṁcay nīrparamārath ke kārane, sādhu dharā śarīr

पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा ।सार-सार को गहि रहे, देइ उड़ाय॥

sādhu aisā cāhie, jaisā sūp subhāysār-sār ko gahi rahe, thoth dei uṛāy

सज्जन सूप जैसा हो: काम की बात रख ले और बेकार भूसा उड़ा दे।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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एक है, होय अनेक।कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक॥

āvat gārī ek hai, ulaṭan hoy anekkah kabīr nahiṁ ulaṭiye, vahī ek kī ek

आई हुई गाली एक होती है, पलटकर दो तो अनेक हो जाती हैं। मत पलटो, तो एक की एक रहेगी।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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को न सताइए, जाकी मोटी ।बिना जीव की से, लोहा हो जाय॥

durbal ko na satāie, jākī moṭī hāybinā jīv kī hāy se, lohā bhasm ho jāy

कमज़ोर को मत सताओ, उसकी हाय बहुत भारी होती है। बेजान खाल की धौंकनी से भी लोहा पिघल जाता है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सबते भली, लघुता ते सब होय।जैसे का चन्द्रमा, शीश सब कोय॥

sabate laghutāī bhalī, laghutā te sab hoyjaise dūj kā candramā, śīś nave sab koy

सबसे भली है विनम्रता, छोटेपन से सब होता है। दूज के चाँद को सब सिर झुकाते हैं।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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रोज़ सुबह एक पंक्ति

एक हफ़्ते तक रोज़ एक पंक्ति, आपकी बात के लिए, ईमेल पर।

मेरा हफ़्ता भेजें

समय और जीवन

जो आज है वह कल नहीं रहेगा। कबीर यह बात कई तरह से कहते हैं।

करे सो आज कर, आज करे सो अब।पल में होएगी, करेगा कब॥

kāl kare so āj kar, āj kare so abpal meṁ pralay hoegī, bahuri karegā kab

कल का काम आज करो, आज का अभी। पल भर में सब खत्म हो सकता है, फिर कब करोगे।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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धीरे-धीरे रे , धीरे सब कुछ होय।माली सौ घड़ा, आए फल होय॥

dhīre-dhīre re manā, dhīre sab kuch hoymālī sīṁce sau ghaṛā, ṝtu āe phal hoy

मन, धीरज रखो। माली सौ घड़े पानी डाले, फल तो मौसम आने पर ही लगेगा।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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चलती देख के, दिया कबीरा रोय।दुइ भीतर आइके, बचा न कोय॥

calatī cakkī dekh ke, diyā kabīrā roydui paṭ bhītar āike, sābit bacā na koy

चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े। दो पाटों के बीच आकर कोई दाना साबुत नहीं बचता।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कहे कुम्हार से, तु क्या ।एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी ॥

māṭī kahe kumhār se, tu kyā rauṁde moyek din aisā āegā, maiṁ rauṁdūṁgī toy

मिट्टी कुम्हार से कहती है: आज तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन मैं तुझे रौंदूँगी।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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पानी , अस की जात।देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा ॥

pānī kerā budabudā, as mānas kī jātdekhat hī chip jāegā, jyoṁ tārā parabhāt

इंसान का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है। जैसे सुबह होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही चला जाएगा।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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रात सोय के, गंवाया खाय।हीरा जन्म अनमोल था, बदले जाए॥

rāt gaṁvāī soy ke, divas gaṁvāyā khāyhīrā janm anamol thā, kauṛī badale jāe

रात सोने में और दिन खाने में गँवा दिया। हीरे जैसा अनमोल जन्म कौड़ी के भाव चला गया।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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दिन गये गुरु से किया न ।अब पछतावा क्या करै चिड़ियाँ गई खेत॥

āche din pāche gaye guru se kiyā na hetab pachatāvā kyā karai ciṛiyāṁ cug gaī khet

अच्छे दिन बीत गए, गुरु से प्रेम नहीं किया। अब पछताने से क्या, चिड़िया खेत चुग गई।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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आए हैं सो जाएँगे, राजा ।एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर॥

āe haiṁ so jāeṁge, rājā raṁk phakīrek siṁhāsan caṛhi cale, ek bāṁdhi jaṁjīr

जो आया है वह जाएगा, राजा हो, गरीब हो या फ़कीर। कोई सिंहासन पर जाता है, कोई ज़ंजीर में।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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मानुष जन्म है, देह न बारम्बार। ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे ॥

durlabh mānuṣ janm hai, deh na bārambārtaruvar jyoṁ pattī jhaṛe, bahuri na lāge ḍār

मनुष्य जन्म मुश्किल से मिलता है, बार-बार नहीं। जैसे झड़ा पत्ता फिर डाल पर नहीं लगता।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।आशा न मरी, कह गए दास कबीर॥

māyā marī na man marā, mar-mar gae śarīrāśā tṛṣṇā na marī, kah gae dās kabīr

न माया मरी, न मन। शरीर मर-मरकर बदलते रहे, पर उम्मीद और प्यास कभी नहीं मरी।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं । सकै तो चेत ले, परी है ख्याल॥

kabīr jo din āj hai, so din nahīṁ kālceti sakai to cet le, mīc parī hai khyāl

जो दिन आज है वह कल नहीं रहेगा। संभल सको तो संभल जाओ, मौत ताक में बैठी है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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कबीर यह संसार है, जैसा फूल।दिन दस के में, झूठे रंग न भूल॥

kabīr yah saṁsār hai, jaisā semal phūldin das ke vyavahār meṁ, jhūṭhe raṁg na bhūl

यह दुनिया सेमल के फूल जैसी है, सुंदर पर खोखली। दस दिन के झूठे रंग में मत भूलो।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों ।बोया पेड़ का, आम कहाँ से खाय॥

karatā thā so kyoṁ kiyā, ab kar kyoṁ pachitāyboyā peṛ babūl kā, ām kahāṁ se khāy

जो किया वह क्यों किया, अब पछताते क्यों हो। बबूल बोया है तो आम कहाँ से खाओगे।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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प्रेम और भक्ति

किताबों से आगे का प्रेम, और भीतर बसे राम।

पढ़-पढ़ जग , भया न कोय।ढाई प्रेम का, पढ़ै सो होय॥

pothī paṛh-paṛh jag muā, paṁḍit bhayā na koyḍhāī ākhar prem kā, paṛhai so paṁḍit hoy

किताबें पढ़-पढ़कर दुनिया थक गई, कोई ज्ञानी न बना। प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ ले, वही ज्ञानी है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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इतना दीजिये, जा में ।मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥

sāīṁ itanā dījiye, jā meṁ kuṭum samāymaiṁ bhī bhūkhā na rahūṁ, sādhu nā bhūkhā jāy

भगवान, बस इतना देना कि परिवार पल जाए। न मैं भूखा रहूँ, न द्वार पर आया साधु।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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दुख में सब करे, सुख में करे न कोय।जो सुख में करे, दुख को होय॥

dukh meṁ sumarin sab kare, sukh meṁ kare na koyjo sukh meṁ sumarin kare, dukh kāhe ko hoy

दुख में सब भगवान को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं। सुख में याद करें तो दुख क्यों आए।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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बसे, ढूंढे बन माहिं।ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं॥

kastūrī kunḍal base, mrag ḍhūṁḍhe ban māhiṁaise ghaṭ-ghaṭ rām hai, duniyā dekhe nāhiṁ

कस्तूरी हिरन की नाभि में है, पर वह जंगल में ढूँढता है। वैसे ही राम हर दिल में है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सात की करौं, सब ।धरती सब करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥

sāt samaṁd kī masi karauṁ, lekhani sab banarāidharatī sab kāgad karauṁ, taū hari guṇ likhyā na jāi

सातों समुद्र की स्याही, सारे जंगल की कलम, धरती का कागज़, फिर भी हरि के गुण न लिखे जाएं।

कबीर ग्रंथावली मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सके तो ले, राम नाम की । फिरे पछताओगे, जाहिं जब छूट॥

lūṭ sake to lūṭ le, rām nām kī lūṭpāche phire pachatāoge, prāṇ jāhiṁ jab chūṭ

राम नाम खुला बँट रहा है, जितना ले सको ले लो। प्राण छूटने पर पछताओगे।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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प्रेम न ऊपजै, प्रेम न बिकाय।राजा-परजा जेहि रुचें, देई ले जाय॥

prem na bāṛī ūpajai, prem na hāṭ bikāyrājā-parajā jehi ruceṁ, śīś deī le jāy

प्रेम न खेत में उगता है, न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, सिर देकर ले जाए।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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तेरा तुझमें, ज्यों में ।कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास॥

terā sāṁī tujhameṁ, jyoṁ pahupan meṁ bāskastūrī kā hiran jyoṁ, phir-phir ṛhūṁṛhat ghās

तेरा भगवान तुझमें है, जैसे फूल में खुशबू। कस्तूरी वाला हिरन फिर भी घास में ढूँढता फिरता है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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ज्यों तेल है, ज्यों में आग।तेरा सांई तुझमें, बस जाग सके तो जाग॥

jyoṁ til māṁhī tel hai, jyoṁ cakamak meṁ āgterā sāṁī tujhameṁ, bas jāg sake to jāg

जैसे तिल में तेल और चकमक में आग, वैसे ही भगवान तुझमें है। जाग सके तो जाग।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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जब मैं था तब नहीं, अब हैं मैं नाहिं।सब मिटि गया, जब दीपक देख्या ॥

jab maiṁ thā tab hari nahīṁ, ab hari haiṁ maiṁ nāhiṁsab aṁdhiyārā miṭi gayā, jab dīpak dekhyā māhiṁ

जब तक "मैं" था, हरि नहीं थे। अब हरि हैं, "मैं" नहीं। भीतर दीपक देखा तो सारा अंधेरा मिट गया।

कबीर ग्रंथावली मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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मेरे की देखों । देखन मैं गई मैं भी हो गई ॥

lālī mere lāl kī jit dekhoṁ tit lāllālī dekhan maiṁ gaī maiṁ bhī ho gaī lāl

मेरे प्रिय की लाली जहाँ देखूँ वहीं है। उसे देखने गई तो मैं भी उसी रंग में रंग गई।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न होय।सो जाने जो , जाकी होय॥

āg jo lāgī samudr meṁ, dhuāṁ na prakaṭ hoyso jāne jo jaramuā, jākī lāī hoy

समुद्र में लगी आग का धुआँ नहीं दिखता। उसे वही जानता है जो उसमें जल रहा है, या जिसने लगाई।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सब संसार है, खावै और सौवे। दास कबीर है, जागे अरु ॥

sukhiyā sab saṁsār hai, khāvai aur sauvedukhiyā dās kabīr hai, jāge aru rauve

सारी दुनिया सुखी है, खाती है और सोती है। दुखी तो कबीर है, जो जागता है और रोता है।

कबीर ग्रंथावली मेंकविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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सच और दिखावा

माला, मूर्ति और जाति के दिखावे पर कबीर की सीधी बात।

फेरत भया, फिरा न मन का ।कर का मन का डार दें, मन का ॥

mālā pherat jug bhayā, phirā na man kā pherkar kā man kā ḍār deṁ, man kā manakā pher

माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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जाति न पूछो की, पूछ लीजिये ज्ञान। करो का, पड़ा रहन दो ॥

jāti na pūcho sādhu kī, pūch lījiye jñānmol karo taravār kā, paṛā rahan do myān

साधु की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान पूछो। मोल तलवार का होता है, म्यान का नहीं।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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समान है, माँगो कोई भीख। से तो मरना भला, यह सतगुरु की ॥

māṁgan maraṇ samān hai, mati māṁgo koī bhīkhmāṁgan se to maranā bhalā, yah sataguru kī sīkh

माँगना मरने जैसा है, किसी से भीख मत माँगो। माँगने से मरना अच्छा, यही गुरु की सीख है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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बराबर नहीं, झूठ बराबर पाप।जाके में है, ताके हरि आप॥

sāṁc barābar tap nahīṁ, jhūṭh barābar pāpjāke hiradai meṁ sāṁc hai, tāke hiradai hari āp

सच जैसी कोई तपस्या नहीं, झूठ जैसा कोई पाप नहीं। जिसके दिल में सच है, उसमें भगवान रहते हैं।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं । ये चक्की भली, पीस खाय संसार॥

pāhan pūje hari mileṁ, to maiṁ pūjauṁ pahāryāte ye cakkī bhalī, pīs khāy saṁsār

पत्थर पूजने से भगवान मिलें तो मैं पहाड़ पूजूँ। उससे तो चक्की भली, जिसका पिसा दुनिया खाती है।

कविता-कौमुदी (1917) मेंपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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मन तन , अंग।तासों तो कौवा भला, तन मन एकहि रंग॥

man mailā tan ūjarā, bagulā kapaṭī aṁgtāsoṁ to kauvā bhalā, tan man ekahi raṁg

मन मैला और तन उजला, बगुले जैसा कपटी। उससे कौआ भला, जिसका तन और मन एक रंग का है।

गायन परंपरा सेपूरा अर्थ और शब्दार्थ

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ये दोहे कहाँ मिलते हैं

कबीर ने कुछ लिखा नहीं, गाया। उनके दोहे सदियों तक साधुओं और गायकों के ज़रिए फैले, और हर इलाके ने उन्हें अपनी बोली में ढाल लिया। इसलिए हम किसी दोहे को नकली नहीं कहते। हर दोहे पर लिखा है कि वह कहाँ मिलता है:

कबीर ग्रंथावली (श्यामसुंदर दास): कबीर की साखियों का सबसे पुराना छपा हुआ विद्वानों का संस्करण। कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917): सौ साल से ज़्यादा पुराना संग्रह। गायन परंपरा: वे दोहे जो इन दोनों में नहीं, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाए जाते हैं।

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लोग अक्सर पूछते हैं

कबीर का सबसे प्रसिद्ध दोहा कौन सा है?

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिया बताय॥" गुरु पूर्णिमा पर यह सबसे ज़्यादा भेजा जाता है। इसका मतलब है कि भगवान तक पहुँचाने वाले गुरु को पहले प्रणाम।

कबीर के दोहे किस भाषा में हैं?

कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहते हैं: इसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी और पंजाबी के शब्द मिले हुए हैं। इसीलिए एक ही दोहे के कई रूप मिलते हैं।

साखी और दोहा में क्या फ़र्क है?

कबीर ग्रंथावली में उनके दोहों को साखी कहा गया है, यानी साक्षी: जो खुद देखा, वही कहा। छंद के हिसाब से ये दोहे ही हैं।

क्या ये सभी दोहे सच में कबीर के हैं?

कबीर ने खुद कुछ नहीं लिखा। उनके दोहे सदियों तक गाकर आगे बढ़े और बाद में संग्रहों में लिखे गए। इसलिए हर दोहे के साथ हमने लिखा है कि वह कहाँ मिलता है: कबीर ग्रंथावली, कविता-कौमुदी (1917), या गायन परंपरा।

कबीर जयंती 2027 में कब है?

कबीर जयंती ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाई जाती है। 2027 में यह 18 जून को है।

गुरु पूर्णिमा 2027 पर कौन सा दोहा भेजें?

गुरु पूर्णिमा 18 जुलाई 2027 को है। "गुरु गोविंद दोऊ खड़े" और "गुरु कुम्हार सिष कुंभ है" सबसे ज़्यादा पसंद किए जाते हैं।

स्रोत और तरीका

पाठ: कविता-कौमुदी भाग 1 (1917) और कबीर ग्रंथावली विकिसोर्स और कविताकोश से, और कविताकोश का कबीर दोहावली संग्रह। साफ़ दिखने वाली टाइपिंग की गलतियाँ ठीक की गई हैं। अर्थ और शब्दार्थ Wisdom के अपने हैं।

कबीर के नाम 15 दोहों में नारी या कामिनी शब्द आता है। हमने हर एक पढ़ा। 2 दोहे जो स्त्रियों को नीचा दिखाते हैं, यहाँ नहीं हैं। "क्षमा बड़न को" वाला दोहा रहीम का है, इसलिए वह भी नहीं।

कुल 84 दोहे संग्रह में दोहराए गए या थोड़े बदले रूप में थे; हर दोहा यहाँ एक बार है।