बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर: अर्थ सहित

"बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।

कबहुँ न फल , नदी न नीर। के कारने, साधु धरा शरीर॥

birachā kabahuṁ na phal bhakhai, nadī na aṁcay nīrparamārath ke kārane, sādhu dharā śarīr

पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं।

A tree never eats its fruit, a river never drinks its water. Saints live for the good of others.

गायन परंपरा से

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शब्दार्थ

बिरछा
पेड़ (tree)
भखै
खाए (eats)
अंचय
पिए (drinks)
परमारथ
दूसरों की भलाई (the good of others)

यह दोहा कहाँ मिलता है

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ

विषय: बोली और व्यवहार।

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लोग अक्सर पूछते हैं

"बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर" का अर्थ क्या है?

पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं।

यह दोहा किस संग्रह में है?

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। कबीर के दोहे सदियों तक गाए गए, इसलिए शब्दों में थोड़ा फ़र्क मिल सकता है।

What does this doha mean in English?

A tree never eats its fruit, a river never drinks its water. Saints live for the good of others.

स्रोत और तरीका

पाठ: Kabir Dohavali (Kavitakosh compilation)। अर्थ और शब्दार्थ Wisdom के अपने हैं।

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