"बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।
कबहुँनफल,नदीननीर।केकारने,साधुधराशरीर॥
birachā kabahuṁ na phal bhakhai, nadī na aṁcay nīrparamārath ke kārane, sādhu dharā śarīr
पेड़ अपना फल नहीं खाता, नदी अपना पानी नहीं पीती। संत दूसरों के भले के लिए शरीर धरते हैं।
A tree never eats its fruit, a river never drinks its water. Saints live for the good of others.
गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ
विषय: बोली और व्यवहार।
एक पंक्ति रोज़ अपने साथ रखें
एक हफ़्ते तक रोज़ एक पंक्ति, आपकी बात के लिए, ईमेल पर।