चाणक्य नीति: श्लोक और उनका सीधा अर्थ

हर श्लोक मूल संस्कृत में, उसकी अध्याय और श्लोक संख्या की मुहर के साथ। नीचे अपनी स्थिति चुनें और तीन श्लोक पाएं।

चाणक्य नीति 17 अध्यायों में लगभग 340 संस्कृत श्लोकों का संग्रह है, जो चाणक्य के नाम से चलता है। "बहुत सीधे मत बनो, जंगल में सीधे पेड़ ही कटते हैं" श्लोक 7.12 है। यहाँ 61 श्लोक हैं, हर एक पर अध्याय और श्लोक संख्या की मुहर और आसान हिंदी अर्थ।

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एक स्थिति चुनें। चाणक्य नीति के तीन श्लोक दिखेंगे।

नई नौकरी या नया काम

कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥

kaḥ kālaḥ kāni mitrāṇi ko deśaḥ kau vyayāgamaukaścāhaṃ kā ca me śaktiriti cintyaṃ muhurmuhuḥ

बार-बार सोचो: समय कैसा है, मित्र कौन हैं, जगह कैसी है, आमदनी-खर्च कितना है, मेरी ताकत कितनी है।

चाणक्य नीति, अध्याय 4, श्लोक 18

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मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत् ।मन्त्रेण रक्षयेद्गूढं कार्ये चापि नियोजयेत् ॥

manasā cintitaṃ kāryaṃ vācā naiva prakāśayetmantreṇa rakṣayedgūḍhaṃ kārye cāpi niyojayet

मन में सोचा काम ज़ुबान पर मत लाओ। सलाह से उसे छिपाकर रखो और चुपचाप पूरा करो।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 7

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तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक्प्रवर्तते ॥

tāvanmaunena nīyante kokilaiścaiva vāsarāḥyāvatsarvajanānandadāyinī vākpravartate

कोयल तब तक चुप रहकर दिन बिताती है, जब तक उसकी आवाज़ सबको खुश करने लायक न हो जाए।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 18

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कोई प्रतिद्वंद्वी

अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् ।आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा ॥

anulomena balinaṃ pratilomena durjanamātmatulyabalaṃ śatruṃ vinayena balena vā

ताकतवर से उसके अनुकूल चलकर निपटो, दुष्ट से उलटकर, और बराबर वाले से विनम्रता या ताकत से।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 10

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विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम् ।अमित्रादपि सद्वृत्तं बालादपि सुभाषितम् ॥

viṣādapyamṛtaṃ grāhyamamedhyādapi kāñcanamamitrādapi sadvṛttaṃ bālādapi subhāṣitam

ज़हर से भी अमृत ले लो, गंदगी से भी सोना। दुश्मन से भी अच्छा आचरण और बच्चे से भी अच्छी बात सीख लो।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 16

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बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।वर्षाधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥

bahūnāṃ caiva sattvānāṃ samavāyo ripuñjayaḥvarṣādhārādharo meghastṛṇairapi nivāryate

बहुत से लोग मिल जाएं तो दुश्मन हार जाता है। तिनके मिलकर भी बारिश की धार रोक लेते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 4

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पैसे की बात

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

āpadarthe dhanaṃ rakṣecchrīmatāṃ kuta āpadaḥkadāciccalate lakṣmīḥ sañcito'pi vinaśyati

बुरे वक्त के लिए धन बचाकर रखो। अमीर पर भी मुसीबत आती है, और लक्ष्मी जाने लगे तो जमा पूँजी भी घटती है।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 7

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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् ।तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥

upārjitānāṃ vittānāṃ tyāga eva hi rakṣaṇamtaḍāgodarasaṃsthānāṃ parīvāha ivāmbhasām

कमाए हुए धन की रक्षा उसे सही जगह खर्च करने से होती है, जैसे बहता पानी तालाब को साफ़ रखता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 14

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अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति ।प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति ॥

anyāyopārjitaṃ dravyaṃ daśa varṣāṇi tiṣṭhatiprāpte caikādaśe varṣe samūlaṃ tadvinaśyati

गलत तरीके से कमाया धन दस साल टिकता है। ग्यारहवें साल वह जड़ समेत चला जाता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 15, श्लोक 6

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दोस्त ने साथ छोड़ा

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

āture vyasane prāpte durbhikṣe śatrusaṅkaṭerājadvāre śmaśāne ca yastiṣṭhati sa bāndhavaḥ

सच्चा अपना वही है जो बीमारी, मुसीबत, अकाल, दुश्मन के हमले, कचहरी और श्मशान में साथ खड़ा रहे।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 12

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परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥

parokṣe kāryahantāraṃ pratyakṣe priyavādinamvarjayettādṛśaṃ mitraṃ viṣakumbhaṃ payomukham

जो पीठ पीछे काम बिगाड़े और सामने मीठा बोले, उसे छोड़ दो। वह ऊपर दूध, भीतर ज़हर का घड़ा है।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 5

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न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् ।कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत् ॥

na viśvasetkumitre ca mitre cāpi na viśvasetkadācitkupitaṃ mitraṃ sarvaṃ guhyaṃ prakāśayet

बुरे मित्र पर भरोसा मत करो, और अच्छे मित्र पर भी आँख मूँदकर नहीं। नाराज़ होकर वह सारे राज़ खोल सकता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 6

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लोग, मित्र और विरोधी

किस पर भरोसा करें, किससे बचें, और विरोधी से कैसे निपटें।

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

āture vyasane prāpte durbhikṣe śatrusaṅkaṭerājadvāre śmaśāne ca yastiṣṭhati sa bāndhavaḥ

सच्चा अपना वही है जो बीमारी, मुसीबत, अकाल, दुश्मन के हमले, कचहरी और श्मशान में साथ खड़ा रहे।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 12

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परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥

parokṣe kāryahantāraṃ pratyakṣe priyavādinamvarjayettādṛśaṃ mitraṃ viṣakumbhaṃ payomukham

जो पीठ पीछे काम बिगाड़े और सामने मीठा बोले, उसे छोड़ दो। वह ऊपर दूध, भीतर ज़हर का घड़ा है।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 5

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न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् ।कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत् ॥

na viśvasetkumitre ca mitre cāpi na viśvasetkadācitkupitaṃ mitraṃ sarvaṃ guhyaṃ prakāśayet

बुरे मित्र पर भरोसा मत करो, और अच्छे मित्र पर भी आँख मूँदकर नहीं। नाराज़ होकर वह सारे राज़ खोल सकता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 6

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दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।यन्मैत्री क्रियते पुंभिर्नरः शीघ्रं विनश्यति ॥

durācārī durādṛṣṭirdurāvāsī ca durjanaḥyanmaitrī kriyate puṃbhirnaraḥ śīghraṃ vinaśyati

जिसका आचरण बुरा, नज़र बुरी और ठिकाना बुरा हो, उससे दोस्ती करने वाला जल्दी बर्बाद होता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 19

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दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः ।सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥

durjanasya ca sarpasya varaṃ sarpo na durjanaḥsarpo daṃśati kāle tu durjanastu pade pade

दुष्ट और साँप में साँप बेहतर है। साँप समय आने पर डसता है, दुष्ट हर कदम पर।

चाणक्य नीति, अध्याय 3, श्लोक 4

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विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम् ।अमित्रादपि सद्वृत्तं बालादपि सुभाषितम् ॥

viṣādapyamṛtaṃ grāhyamamedhyādapi kāñcanamamitrādapi sadvṛttaṃ bālādapi subhāṣitam

ज़हर से भी अमृत ले लो, गंदगी से भी सोना। दुश्मन से भी अच्छा आचरण और बच्चे से भी अच्छी बात सीख लो।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 16

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अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम् ।आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा ॥

anulomena balinaṃ pratilomena durjanamātmatulyabalaṃ śatruṃ vinayena balena vā

ताकतवर से उसके अनुकूल चलकर निपटो, दुष्ट से उलटकर, और बराबर वाले से विनम्रता या ताकत से।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 10

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बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।वर्षाधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥

bahūnāṃ caiva sattvānāṃ samavāyo ripuñjayaḥvarṣādhārādharo meghastṛṇairapi nivāryate

बहुत से लोग मिल जाएं तो दुश्मन हार जाता है। तिनके मिलकर भी बारिश की धार रोक लेते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 4

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परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः ।त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥

parasparasya marmāṇi ye bhāṣante narādhamāḥta eva vilayaṃ yānti valmīkodarasarpavat

जो एक-दूसरे की कमज़ोर नस का भेद खोलते हैं, वे बाँबी में घुसे साँप की तरह खुद नष्ट होते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 9, श्लोक 2

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दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः ।यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥

dūrastho'pi na dūrastho yo yasya manasi sthitaḥyo yasya hṛdaye nāsti samīpastho'pi dūrataḥ

जो मन में बसा है वह दूर रहकर भी पास है। जो दिल में नहीं, वह पास रहकर भी दूर है।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 9

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प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥtasmāttadeva vaktavyaṃ vacane kā daridratā

मीठे बोल से सब खुश होते हैं, इसलिए मीठा ही बोलो। बोलने में कंजूसी कैसी।

चाणक्य नीति, अध्याय 16, श्लोक 14

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मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ट्रवत् ।आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥

mātṛvatparadāreṣu paradravyeṣu loṣṭravatātmavatsarvabhūteṣu yaḥ paśyati sa paṇḍitaḥ

जो पराई स्त्री को माँ समान, पराए धन को मिट्टी समान और सबको अपने समान देखे, वही ज्ञानी है।

चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 14

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काम और मेहनत

योजना, चुप्पी, मेहनत, और सही समय की पहचान।

कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥

kaḥ kālaḥ kāni mitrāṇi ko deśaḥ kau vyayāgamaukaścāhaṃ kā ca me śaktiriti cintyaṃ muhurmuhuḥ

बार-बार सोचो: समय कैसा है, मित्र कौन हैं, जगह कैसी है, आमदनी-खर्च कितना है, मेरी ताकत कितनी है।

चाणक्य नीति, अध्याय 4, श्लोक 18

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मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत् ।मन्त्रेण रक्षयेद्गूढं कार्ये चापि नियोजयेत् ॥

manasā cintitaṃ kāryaṃ vācā naiva prakāśayetmantreṇa rakṣayedgūḍhaṃ kārye cāpi niyojayet

मन में सोचा काम ज़ुबान पर मत लाओ। सलाह से उसे छिपाकर रखो और चुपचाप पूरा करो।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 7

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उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम् ।मौनेन कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम् ॥

udyoge nāsti dāridryaṃ japato nāsti pātakammaunena kalaho nāsti nāsti jāgarite bhayam

मेहनत करने वाले के यहाँ गरीबी नहीं, जप करने वाले पर पाप नहीं, चुप रहने वाले से झगड़ा नहीं, जागने वाले को डर नहीं।

चाणक्य नीति, अध्याय 3, श्लोक 11

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को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṃ kiṃ dūraṃ vyavasāyināmko videśaḥ suvidyānāṃ kaḥ paraḥ priyavādinām

समर्थ के लिए कौन सा बोझ भारी, मेहनती के लिए कौन सी जगह दूर, विद्वान के लिए कौन सा देश पराया।

चाणक्य नीति, अध्याय 3, श्लोक 13

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प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति ।सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते ॥

prabhūtaṃ kāryamalpaṃ vā yannaraḥ kartumicchatisarvārambheṇa tatkāryaṃ siṃhādekaṃ pracakṣate

काम छोटा हो या बड़ा, जो करना है उसे पूरी ताकत से करो। यह शेर से सीखो।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 16

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प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु ।स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् ॥

pratyutthānaṃ ca yuddhaṃ ca saṃvibhāgaṃ ca bandhuṣusvayamākramya bhuktaṃ ca śikṣeccatvāri kukkuṭāt

मुर्गे से चार बातें सीखो: समय पर उठना, डटकर लड़ना, अपनों में बाँटना, और अपनी मेहनत का खाना।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 18

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सुश्रान्तोऽपि वहेद्भारं शीतोष्णं न च श्यति ।सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात् ॥

suśrānto'pi vahedbhāraṃ śītoṣṇaṃ na ca śyatisantuṣṭaścarate nityaṃ trīṇi śikṣecca gardabhāt

गधे से तीन बातें सीखो: थककर भी बोझ ढोना, सर्दी-गर्मी की परवाह न करना, और हमेशा संतुष्ट रहना।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 21

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नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः ॥

nātyantaṃ saralairbhāvyaṃ gatvā paśya vanasthalīmchidyante saralāstatra kubjāstiṣṭhanti pādapāḥ

ज़रूरत से ज़्यादा सीधे मत बनो। जंगल में जाकर देखो, सीधे पेड़ काटे जाते हैं और टेढ़े खड़े रहते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 12

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अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥

anāgatavidhātā ca pratyutpannamatistathādvāvetau sukhamedhete yadbhaviṣyo vinaśyati

जो आगे की तैयारी रखे और मौके पर सूझ से काम ले, वह सुखी रहता है। "जो होगा देखा जाएगा" वाला डूबता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 7

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तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक्प्रवर्तते ॥

tāvanmaunena nīyante kokilaiścaiva vāsarāḥyāvatsarvajanānandadāyinī vākpravartate

कोयल तब तक चुप रहकर दिन बिताती है, जब तक उसकी आवाज़ सबको खुश करने लायक न हो जाए।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 18

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अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥

arthanāśaṃ manastāpaṃ gṛhe duścaritāni cavañcanaṃ cāpamānaṃ ca matimānna prakāśayet

समझदार इंसान पैसे का नुकसान, मन का दुख, घर की बुरी बातें, धोखा और अपमान किसी को नहीं बताता।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 1

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गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थिताः ।प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते ॥

guṇairuttamatāṃ yāti noccairāsanasaṃsthitāḥprāsādaśikharastho'pi kākaḥ kiṃ garuḍāyate

इंसान गुणों से बड़ा बनता है, ऊँची कुर्सी से नहीं। महल की चोटी पर बैठा कौआ गरुड़ नहीं बन जाता।

चाणक्य नीति, अध्याय 16, श्लोक 6

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इन्द्रियाणि च संयम्य रागद्वेषविवर्जितः ।समदुःखसुखः शान्तः तत्त्वज्ञः साधुरुच्यते ॥

indriyāṇi ca saṃyamya rāgadveṣavivarjitaḥsamaduḥkhasukhaḥ śāntaḥ tattvajñaḥ sādhurucyate

जो इंद्रियों को साधे, राग और द्वेष से दूर रहे, सुख-दुख में एक जैसा और शांत रहे, वही सज्जन है।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 17

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हर सुबह काम की एक पंक्ति

एक हफ़्ते तक रोज़ एक श्लोक, आपकी बात के लिए, ईमेल पर।

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धन

कमाना, बचाना, खर्च करना, और कौन सा पैसा टिकता नहीं।

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

āpadarthe dhanaṃ rakṣecchrīmatāṃ kuta āpadaḥkadāciccalate lakṣmīḥ sañcito'pi vinaśyati

बुरे वक्त के लिए धन बचाकर रखो। अमीर पर भी मुसीबत आती है, और लक्ष्मी जाने लगे तो जमा पूँजी भी घटती है।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 7

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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् ।तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥

upārjitānāṃ vittānāṃ tyāga eva hi rakṣaṇamtaḍāgodarasaṃsthānāṃ parīvāha ivāmbhasām

कमाए हुए धन की रक्षा उसे सही जगह खर्च करने से होती है, जैसे बहता पानी तालाब को साफ़ रखता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 14

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अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति ।प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति ॥

anyāyopārjitaṃ dravyaṃ daśa varṣāṇi tiṣṭhatiprāpte caikādaśe varṣe samūlaṃ tadvinaśyati

गलत तरीके से कमाया धन दस साल टिकता है। ग्यारहवें साल वह जड़ समेत चला जाता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 15, श्लोक 6

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अतिक्लेशेन यद्द्रव्यमतिलोभेन यत्सुखम् ।शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे ॥

atikleśena yaddravyamatilobhena yatsukhamśatrūṇāṃ praṇipātena te hyarthā mā bhavantu me

जो धन बहुत कष्ट से, धर्म तोड़कर या दुश्मन के आगे झुककर मिले, वह मुझे नहीं चाहिए।

चाणक्य नीति, अध्याय 16, श्लोक 11

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अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ च मध्यमाः ।उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥

adhamā dhanamicchanti dhanamānau ca madhyamāḥuttamā mānamicchanti māno hi mahatāṃ dhanam

नीच लोग सिर्फ़ धन चाहते हैं, मध्यम लोग धन और मान, उत्तम लोग सिर्फ़ मान। मान ही बड़ों का धन है।

चाणक्य नीति, अध्याय 8, श्लोक 1

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दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम् ।अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी ॥

dāridryanāśanaṃ dānaṃ śīlaṃ durgatināśanamajñānanāśinī prajñā bhāvanā bhayanāśinī

दान से गरीबी मिटती है, अच्छे आचरण से दुर्गति, समझ से अज्ञान, और सोच-विचार से डर।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 11

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धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा ।आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥

dhanadhānyaprayogeṣu vidyāsaṅgrahaṇe tathāāhāre vyavahāre ca tyaktalajjaḥ sukhī bhavet

लेन-देन, पढ़ाई, खाने और व्यवहार में जो शर्म छोड़ देता है, वह सुखी रहता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 2

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पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनं ।कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥

pustakasthā tu yā vidyā parahastagataṃ dhanaṃkāryakāle samutpanne na sā vidyā na taddhanam

किताब में बंद ज्ञान और दूसरे के हाथ में गया धन, ज़रूरत के वक्त न ज्ञान काम आता है, न धन।

चाणक्य नीति, अध्याय 16, श्लोक 20

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आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम् ।अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम् ॥

ālasyopagatā vidyā parahastagataṃ dhanamalpabījaṃ hataṃ kṣetraṃ hataṃ sainyamanāyakam

आलस से विद्या, दूसरे के हाथ गया धन, कम बीज वाला खेत और बिना नेता की सेना, चारों बर्बाद होते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 7

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विद्या

रोज़ थोड़ा सीखना, और अभ्यास से उसे टिकाना।

श्लोकेन वा तदर्धेन तदर्धार्धाक्षरेण वा ।अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मभिः ॥

ślokena vā tadardhena tadardhārdhākṣareṇa vāabandhyaṃ divasaṃ kuryāddānādhyayanakarmabhiḥ

हर दिन कुछ सीखो: एक श्लोक, आधा, चौथाई या एक अक्षर ही सही। कोई दिन खाली न जाए।

चाणक्य नीति, अध्याय 2, श्लोक 13

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कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी ।प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥

kāmadhenuguṇā vidyā hyakāle phaladāyinīpravāse mātṛsadṛśī vidyā guptaṃ dhanaṃ smṛtam

विद्या कामधेनु जैसी है, हर मौसम फल देती है। परदेस में माँ जैसी पालती है, यह छिपा हुआ धन है।

चाणक्य नीति, अध्याय 4, श्लोक 5

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अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते ।गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते ॥

abhyāsāddhāryate vidyā kulaṃ śīlena dhāryateguṇena jñāyate tvāryaḥ kopo netreṇa gamyate

विद्या अभ्यास से टिकती है, कुल अच्छे स्वभाव से। सज्जन गुण से पहचाना जाता है, गुस्सा आँखों से।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 8

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विद्वान्प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते ॥

vidvānpraśasyate loke vidvān sarvatra pūjyatevidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate

विद्वान की हर जगह तारीफ़ और इज़्ज़त होती है। विद्या से सब कुछ मिलता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 8, श्लोक 20

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धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः ।विद्यारत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु ॥

dhanahīno na hīnaśca dhanikaḥ sa suniścayaḥvidyāratnena hīno yaḥ sa hīnaḥ sarvavastuṣu

जिसके पास धन नहीं, वह गरीब नहीं। जिसके पास विद्या रूपी रत्न नहीं, वह हर तरह से गरीब है।

चाणक्य नीति, अध्याय 10, श्लोक 1

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सुखार्थी चेत्त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम् ।सुखार्थिनः कुतो विद्या सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥

sukhārthī cettyajedvidyāṃ vidyārthī cettyajetsukhamsukhārthinaḥ kuto vidyā sukhaṃ vidyārthinaḥ kutaḥ

आराम चाहिए तो पढ़ाई छोड़ो, पढ़ना है तो आराम छोड़ो। आराम चाहने वाले को विद्या कहाँ।

चाणक्य नीति, अध्याय 10, श्लोक 3

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यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥

yasya nāsti svayaṃ prajñā śāstraṃ tasya karoti kimlocanābhyāṃ vihīnasya darpaṇaḥ kiṃ kariṣyati

जिसकी अपनी समझ नहीं, शास्त्र उसका क्या करेंगे। अंधे के लिए शीशा किस काम का।

चाणक्य नीति, अध्याय 10, श्लोक 9

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खनित्वा हि खनित्रेण भूतले वारि विन्दति ।तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥

khanitvā hi khanitreṇa bhūtale vāri vindatitathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati

जैसे फावड़े से खोदकर पानी मिलता है, वैसे ही सेवा करने वाला शिष्य गुरु का ज्ञान पाता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 17

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जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥsa hetuḥ sarvavidyānāṃ dharmasya ca dhanasya ca

बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। विद्या, धर्म और धन भी ऐसे ही धीरे-धीरे जुड़ते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 22

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विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च ।व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥

vidyā mitraṃ pravāse ca bhāryā mitraṃ gṛheṣu cavyādhitasyauṣadhaṃ mitraṃ dharmo mitraṃ mṛtasya ca

परदेस में विद्या मित्र है, घर में जीवनसाथी, बीमार के लिए दवा, और मरने के बाद धर्म।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 15

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एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना ।वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥

ekenāpi suvṛkṣeṇa puṣpitena sugandhināvāsitaṃ tadvanaṃ sarvaṃ suputreṇa kulaṃ yathā

एक ही फूलों वाला खुशबूदार पेड़ पूरे जंगल को महका देता है, वैसे ही एक अच्छी संतान पूरे कुल को।

चाणक्य नीति, अध्याय 3, श्लोक 14

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मन और समय

बीते और आने वाले कल से निकलकर आज में जीना।

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः ॥

gate śoko na kartavyo bhaviṣyaṃ naiva cintayetvartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ

बीते का शोक मत करो, आने वाले की चिंता मत करो। समझदार लोग वर्तमान में जीते हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 2

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कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥

kālaḥ pacati bhūtāni kālaḥ saṃharate prajāḥkālaḥ supteṣu jāgarti kālo hi duratikramaḥ

समय सबको पकाता है, सबको मिटाता है। सब सो जाएं, समय जागता रहता है। उसे कोई पार नहीं कर सकता।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 7

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स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥

svayaṃ karma karotyātmā svayaṃ tatphalamaśnutesvayaṃ bhramati saṃsāre svayaṃ tasmādvimucyate

इंसान खुद कर्म करता है, खुद फल भोगता है। खुद संसार में भटकता है और खुद ही छूटता है।

चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 9

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नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः ।नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ॥

nāsti kāmasamo vyādhirnāsti mohasamo ripuḥnāsti kopasamo vahnirnāsti jñānātparaṃ sukham

वासना जैसी कोई बीमारी नहीं, मोह जैसा कोई दुश्मन नहीं, क्रोध जैसी कोई आग नहीं, ज्ञान से बड़ा कोई सुख नहीं।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 12

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सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

satyena dhāryate pṛthvī satyena tapate raviḥsatyena vāti vāyuśca sarvaṃ satye pratiṣṭhitam

सत्य से धरती टिकी है, सत्य से सूरज तपता है, सत्य से हवा चलती है। सब सत्य पर टिका है।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 19

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चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे ।चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ॥

calā lakṣmīścalāḥ prāṇāścale jīvitamandirecalācale ca saṃsāre dharma eko hi niścalaḥ

धन चंचल है, प्राण चंचल हैं, जीवन और घर भी। इस बदलती दुनिया में बस धर्म स्थिर है।

चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 20

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यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत् सुखम् ॥

yasya sneho bhayaṃ tasya sneho duḥkhasya bhājanamsnehamūlāni duḥkhāni tāni tyaktvā vaset sukham

जिससे मोह है, उसी से डर है। मोह दुख का बर्तन है। मोह छोड़ो तो सुख से जियो।

चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 6

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ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् ।दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात्सन्तोषमाश्रयेत् ॥

īpsitaṃ manasaḥ sarvaṃ kasya sampadyate sukhamdaivāyattaṃ yataḥ sarvaṃ tasmātsantoṣamāśrayet

मन की हर इच्छा किसकी पूरी होती है। सब कुछ भाग्य के हाथ में है, इसलिए संतोष रखो।

चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 14

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अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसङ्ग्रहः ॥

anityāni śarīrāṇi vibhavo naiva śāśvataḥnityaṃ saṃnihito mṛtyuḥ kartavyo dharmasaṅgrahaḥ

शरीर हमेशा नहीं रहता, धन भी नहीं। मौत हमेशा पास है, इसलिए अच्छे काम अभी करो।

चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 12

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यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः ।तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्ते किं करिष्यति ॥

yāvatsvastho hyayaṃ deho yāvanmṛtyuśca dūrataḥtāvadātmahitaṃ kuryātprāṇānte kiṃ kariṣyati

जब तक शरीर स्वस्थ है और मौत दूर है, तब तक अपना भला कर लो। आखिरी साँस पर क्या करोगे।

चाणक्य नीति, अध्याय 4, श्लोक 4

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उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य न स्यान्महोदयः ॥

utpannapaścāttāpasya buddhirbhavati yādṛśītādṛśī yadi pūrvaṃ syātkasya na syānmahodayaḥ

पछतावे के बाद जो समझ आती है, वह पहले आ जाए तो किसकी तरक्की न हो।

चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 7

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अत्यन्तकोपः कटुका च वाणीदरिद्रता च स्वजनेषु वैरम् ।नीचप्रसंगः कुलहीनसेवाचिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥

atyantakopaḥ kaṭukā ca vāṇīdaridratā ca svajaneṣu vairamnīcaprasaṃgaḥ kulahīnasevācihnāni dehe narakasthitānām

बहुत गुस्सा, कड़वी बोली, अपनों से बैर, बुरी संगत: ऐसे इंसान का जीवन धरती पर ही नरक है।

चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 17

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यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु ।तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः ॥

yasya cittaṃ dravībhūtaṃ kṛpayā sarvajantuṣutasya jñānena mokṣeṇa kiṃ jaṭābhasmalepanaiḥ

जिसका मन सब जीवों के लिए दया से पिघलता है, उसे जटा, भस्म या दिखावे की क्या ज़रूरत।

चाणक्य नीति, अध्याय 15, श्लोक 1

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परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् ।नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे ॥

paropakaraṇaṃ yeṣāṃ jāgarti hṛdaye satāmnaśyanti vipadasteṣāṃ sampadaḥ syuḥ pade pade

जिन सज्जनों के दिल में दूसरों की भलाई जागती है, उनकी मुसीबतें मिटती हैं और कदम-कदम पर संपत्ति मिलती है।

चाणक्य नीति, अध्याय 17, श्लोक 15

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सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥

satyaṃ mātā pitā jñānaṃ dharmo bhrātā dayā sakhāśāntiḥ patnī kṣamā putraḥ ṣaḍete mama bāndhavāḥ

सत्य मेरी माँ है, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शांति जीवनसाथी, क्षमा पुत्र। यही मेरे छह अपने हैं।

चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 11

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यस्मिन्देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासं तत्र न कारयेत् ॥

yasmindeśe na sammāno na vṛttirna ca bāndhavāḥna ca vidyāgamo'pyasti vāsaṃ tatra na kārayet

जहाँ न इज़्ज़त हो, न रोज़गार, न अपने लोग, न सीखने का मौका, वहाँ मत रहो।

चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 8

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चाणक्य ने यह नहीं कहा

चाणक्य के नाम से बहुत सी बातें घूमती हैं। ये तीन सबसे ज़्यादा शेयर होती हैं। हमने इन्हें चाणक्य नीति के सभी 342 श्लोकों से मिलाया।

चाणक्य नीति में नहीं

“जब पूरा विपक्ष एक हो जाए, तो समझ लेना कि राजा ईमानदार है।”

चाणक्य नीति के 342 श्लोकों में ऐसा कुछ नहीं है। Factly ने भी जाँचकर इसे गलत तरीके से चाणक्य के नाम बताया। अर्थशास्त्र एकजुट विरोधियों से निपटने की बात करता है, राजा की ईमानदारी साबित करने की नहीं।

Factly fact check

चाणक्य नीति में नहीं

“कोई भी काम शुरू करने से पहले खुद से तीन सवाल पूछो: मैं यह क्यों कर रहा हूँ, इसका नतीजा क्या होगा, और क्या मैं सफल होऊँगा।”

यह पंक्ति चाणक्य नीति में नहीं है। सबसे करीबी असली श्लोक 4.18 है, जो समय, मित्र, जगह, आमदनी-खर्च और अपनी ताकत पर बार-बार सोचने को कहता है।

असली श्लोक 4.18 पढ़ें

आधा सच

“ज़्यादा ईमानदार मत बनो। सीधे पेड़ पहले काटे जाते हैं।”

पहला आधा हिस्सा सच में है: श्लोक 7.12 कहता है कि बहुत सीधे मत बनो, जंगल में सीधे पेड़ कटते हैं। "ईमानदार" शब्द और आखिरी हिस्सा बाद में जोड़ा गया है। मूल में "सरल" है, यानी सीधा, भोला।

असली श्लोक 7.12 पढ़ें

चाणक्य नीति के 342 श्लोकों में से 73 में स्त्रियों का ज़िक्र है। इनमें से 33 श्लोक स्त्रियों को नीचा दिखाते हैं, वे यहाँ नहीं हैं। कारण: वृद्ध-चाणक्य चाणक्य के नाम से चलने वाले फुटकर नीति-श्लोकों का संग्रह है। स्टर्नबाख़ को लगभग 235 पांडुलिपियों में इसके छह अलग रूप मिले (पी. के. गौतम, IDSA, 2023)। ऐसे में किसी पूरे वर्ग को नीचा दिखाने वाला श्लोक हम चाणक्य की सलाह कहकर नहीं रखते।

स्त्रियों के ज़िक्र वाले श्लोक: 73। हटाए गए: 33।

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लोग अक्सर पूछते हैं

चाणक्य नीति क्या है?

चाणक्य नीति संस्कृत के छोटे नीति-श्लोकों का संग्रह है, जो चाणक्य (कौटिल्य) के नाम से जाना जाता है। इसमें मित्र, धन, विद्या, काम और व्यवहार पर सीधी सलाह है। इसे वृद्ध-चाणक्य या चाणक्य नीति दर्पण भी कहते हैं।

क्या चाणक्य नीति और अर्थशास्त्र एक ही हैं?

नहीं। अर्थशास्त्र राज्य चलाने पर एक बड़ा गद्य ग्रंथ है। चाणक्य नीति छोटे पद्य श्लोकों का अलग संग्रह है। दोनों चाणक्य के नाम से जुड़े हैं, पर भाषा, रूप और विषय अलग हैं।

चाणक्य नीति में कितने अध्याय हैं?

इस संस्करण में 17 अध्याय और 342 श्लोक हैं। अलग-अलग छपे संस्करणों में श्लोकों की गिनती और क्रम थोड़ा बदल जाता है, इसलिए कहीं-कहीं श्लोक संख्या अलग मिल सकती है।

"सीधे पेड़ पहले कटते हैं" किस श्लोक में है?

अध्याय 7, श्लोक 12: "नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥" यानी बहुत सीधे मत बनो, जंगल में सीधे पेड़ कटते हैं और टेढ़े खड़े रहते हैं।

क्या चाणक्य ने कहा था कि विपक्ष एक हो तो राजा ईमानदार है?

नहीं। यह पंक्ति चाणक्य नीति के किसी श्लोक में नहीं है, और Factly की जाँच ने भी इसे गलत तरीके से चाणक्य के नाम बताया।

स्रोत और तरीका

पाठ: चाणक्य नीति (वृद्ध-चाणक्य), 17 अध्याय, 342 श्लोक, Wisdom के संस्कृत संग्रह से। श्लोक संख्या इसी पाठ के हिसाब से है; दूसरे छपे संस्करणों में कुछ अध्यायों की गिनती अलग है। हिंदी अर्थ Wisdom ने सीधे संस्कृत से लिखे हैं।