१३.२
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः ॥
gate śoko na kartavyo bhaviṣyaṃ naiva cintayetvartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ
बीते का शोक मत करो, आने वाले की चिंता मत करो। समझदार लोग वर्तमान में जीते हैं।
चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 2
६.७
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥
kālaḥ pacati bhūtāni kālaḥ saṃharate prajāḥkālaḥ supteṣu jāgarti kālo hi duratikramaḥ
समय सबको पकाता है, सबको मिटाता है। सब सो जाएं, समय जागता रहता है। उसे कोई पार नहीं कर सकता।
चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 7
६.९
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥
svayaṃ karma karotyātmā svayaṃ tatphalamaśnutesvayaṃ bhramati saṃsāre svayaṃ tasmādvimucyate
इंसान खुद कर्म करता है, खुद फल भोगता है। खुद संसार में भटकता है और खुद ही छूटता है।
चाणक्य नीति, अध्याय 6, श्लोक 9
५.१२
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः ।नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ॥
nāsti kāmasamo vyādhirnāsti mohasamo ripuḥnāsti kopasamo vahnirnāsti jñānātparaṃ sukham
वासना जैसी कोई बीमारी नहीं, मोह जैसा कोई दुश्मन नहीं, क्रोध जैसी कोई आग नहीं, ज्ञान से बड़ा कोई सुख नहीं।
चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 12
५.१९
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
satyena dhāryate pṛthvī satyena tapate raviḥsatyena vāti vāyuśca sarvaṃ satye pratiṣṭhitam
सत्य से धरती टिकी है, सत्य से सूरज तपता है, सत्य से हवा चलती है। सब सत्य पर टिका है।
चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 19
५.२०
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे ।चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ॥
calā lakṣmīścalāḥ prāṇāścale jīvitamandirecalācale ca saṃsāre dharma eko hi niścalaḥ
धन चंचल है, प्राण चंचल हैं, जीवन और घर भी। इस बदलती दुनिया में बस धर्म स्थिर है।
चाणक्य नीति, अध्याय 5, श्लोक 20
१३.६
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत् सुखम् ॥
yasya sneho bhayaṃ tasya sneho duḥkhasya bhājanamsnehamūlāni duḥkhāni tāni tyaktvā vaset sukham
जिससे मोह है, उसी से डर है। मोह दुख का बर्तन है। मोह छोड़ो तो सुख से जियो।
चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 6
१३.१४
ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् ।दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात्सन्तोषमाश्रयेत् ॥
īpsitaṃ manasaḥ sarvaṃ kasya sampadyate sukhamdaivāyattaṃ yataḥ sarvaṃ tasmātsantoṣamāśrayet
मन की हर इच्छा किसकी पूरी होती है। सब कुछ भाग्य के हाथ में है, इसलिए संतोष रखो।
चाणक्य नीति, अध्याय 13, श्लोक 14
१२.१२
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसङ्ग्रहः ॥
anityāni śarīrāṇi vibhavo naiva śāśvataḥnityaṃ saṃnihito mṛtyuḥ kartavyo dharmasaṅgrahaḥ
शरीर हमेशा नहीं रहता, धन भी नहीं। मौत हमेशा पास है, इसलिए अच्छे काम अभी करो।
चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 12
४.४
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः ।तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्ते किं करिष्यति ॥
yāvatsvastho hyayaṃ deho yāvanmṛtyuśca dūrataḥtāvadātmahitaṃ kuryātprāṇānte kiṃ kariṣyati
जब तक शरीर स्वस्थ है और मौत दूर है, तब तक अपना भला कर लो। आखिरी साँस पर क्या करोगे।
चाणक्य नीति, अध्याय 4, श्लोक 4
१४.७
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य न स्यान्महोदयः ॥
utpannapaścāttāpasya buddhirbhavati yādṛśītādṛśī yadi pūrvaṃ syātkasya na syānmahodayaḥ
पछतावे के बाद जो समझ आती है, वह पहले आ जाए तो किसकी तरक्की न हो।
चाणक्य नीति, अध्याय 14, श्लोक 7
७.१७
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणीदरिद्रता च स्वजनेषु वैरम् ।नीचप्रसंगः कुलहीनसेवाचिह्नानि देहे नरकस्थितानाम् ॥
atyantakopaḥ kaṭukā ca vāṇīdaridratā ca svajaneṣu vairamnīcaprasaṃgaḥ kulahīnasevācihnāni dehe narakasthitānām
बहुत गुस्सा, कड़वी बोली, अपनों से बैर, बुरी संगत: ऐसे इंसान का जीवन धरती पर ही नरक है।
चाणक्य नीति, अध्याय 7, श्लोक 17
१५.१
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु ।तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः ॥
yasya cittaṃ dravībhūtaṃ kṛpayā sarvajantuṣutasya jñānena mokṣeṇa kiṃ jaṭābhasmalepanaiḥ
जिसका मन सब जीवों के लिए दया से पिघलता है, उसे जटा, भस्म या दिखावे की क्या ज़रूरत।
चाणक्य नीति, अध्याय 15, श्लोक 1
१७.१५
परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम् ।नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे ॥
paropakaraṇaṃ yeṣāṃ jāgarti hṛdaye satāmnaśyanti vipadasteṣāṃ sampadaḥ syuḥ pade pade
जिन सज्जनों के दिल में दूसरों की भलाई जागती है, उनकी मुसीबतें मिटती हैं और कदम-कदम पर संपत्ति मिलती है।
चाणक्य नीति, अध्याय 17, श्लोक 15
१२.११
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥
satyaṃ mātā pitā jñānaṃ dharmo bhrātā dayā sakhāśāntiḥ patnī kṣamā putraḥ ṣaḍete mama bāndhavāḥ
सत्य मेरी माँ है, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शांति जीवनसाथी, क्षमा पुत्र। यही मेरे छह अपने हैं।
चाणक्य नीति, अध्याय 12, श्लोक 11
१.८
यस्मिन्देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासं तत्र न कारयेत् ॥
yasmindeśe na sammāno na vṛttirna ca bāndhavāḥna ca vidyāgamo'pyasti vāsaṃ tatra na kārayet
जहाँ न इज़्ज़त हो, न रोज़गार, न अपने लोग, न सीखने का मौका, वहाँ मत रहो।
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 8