"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: मन, धीरज रखो। माली सौ घड़े पानी डाले, फल तो मौसम आने पर ही लगेगा। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।
धीरे-धीरेरे,धीरेसबकुछहोय।मालीसौघड़ा,आएफलहोय॥
dhīre-dhīre re manā, dhīre sab kuch hoymālī sīṁce sau ghaṛā, ṝtu āe phal hoy
मन, धीरज रखो। माली सौ घड़े पानी डाले, फल तो मौसम आने पर ही लगेगा।
Slowly, mind, everything comes slowly. Water the tree a hundred times, it fruits in its season.
गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ
विषय: समय और जीवन।
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