"गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाँय" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम, क्योंकि उन्होंने ही भगवान तक पहुँचाया। यह दोहा कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917) में मिलता है।
गुरुदोऊखड़ेलागू।गुरुआपनेजिनदिया॥
guru goviṁd doū khaṛe kāke lāgū pāṁybalihārī guru āpane jin goviṁd diyā batāy
गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम, क्योंकि उन्होंने ही भगवान तक पहुँचाया।
If guru and God both stood before me, I would bow to the guru first. He showed me God.