होम कबीर के दोहे रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय: अर्थ सहित "रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: रात सोने में और दिन खाने में गँवा दिया। हीरे जैसा अनमोल जन्म कौड़ी के भाव चला गया। यह दोहा कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917) में मिलता है।
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय। हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाए॥
rāt gaṁvāī soy ke, divas gaṁvāyā khāy hīrā janm anamol thā, kauṛī badale jāe
रात सोने में और दिन खाने में गँवा दिया। हीरे जैसा अनमोल जन्म कौड़ी के भाव चला गया।
Nights lost to sleep, days to eating. A life worth a diamond went for a shell.
कविता-कौमुदी (1917) में
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शब्दार्थ
गंवाई खो दी (wasted)
दिवस दिन (day)
कौड़ी सबसे छोटा सिक्का (a cowrie shell, almost nothing) यह दोहा कहाँ मिलता है कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917)। छपे हुए संग्रह में मिलना इसे कबीर की परंपरा से जोड़ता है, क्योंकि कबीर ने खुद कुछ नहीं लिखा। स्रोत पाठ
विषय: समय और जीवन।
एक पंक्ति रोज़ अपने साथ रखें लोग अक्सर पूछते हैं "रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय" का अर्थ क्या है? रात सोने में और दिन खाने में गँवा दिया। हीरे जैसा अनमोल जन्म कौड़ी के भाव चला गया।
यह दोहा किस संग्रह में है? कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917)। कबीर के दोहे सदियों तक गाए गए, इसलिए शब्दों में थोड़ा फ़र्क मिल सकता है।
What does this doha mean in English? Nights lost to sleep, days to eating. A life worth a diamond went for a shell.
स्रोत और तरीका पाठ: Kabir Dohavali (Kavitakosh compilation)। टाइपिंग की गलती ठीक की गई: कौंड़ी से कौड़ी। अर्थ और शब्दार्थ Wisdom के अपने हैं।
कविता-कौमुदी (1917) में