"साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: सज्जन सूप जैसा हो: काम की बात रख ले और बेकार भूसा उड़ा दे। यह दोहा कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917) में मिलता है।
साधुऐसाचाहिए,जैसा।सार-सारकोगहिरहे,देइउड़ाय॥
sādhu aisā cāhie, jaisā sūp subhāysār-sār ko gahi rahe, thoth dei uṛāy
सज्जन सूप जैसा हो: काम की बात रख ले और बेकार भूसा उड़ा दे।
Be like a winnowing basket: keep the grain, let the husk blow away.