"लाली मेरे लाल की जित देखों तित लाल" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: मेरे प्रिय की लाली जहाँ देखूँ वहीं है। उसे देखने गई तो मैं भी उसी रंग में रंग गई। यह दोहा कविता-कौमुदी भाग 1 (रामनरेश त्रिपाठी, 1917) में मिलता है।
मेरेकीदेखों।देखनमैंगईमैंभीहोगई॥
lālī mere lāl kī jit dekhoṁ tit lāllālī dekhan maiṁ gaī maiṁ bhī ho gaī lāl
मेरे प्रिय की लाली जहाँ देखूँ वहीं है। उसे देखने गई तो मैं भी उसी रंग में रंग गई।
My Beloved's red is everywhere I look. I went to see it and turned red myself.