माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर: अर्थ सहित

"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।

फेरत भया, फिरा न मन का ।कर का मन का डार दें, मन का ॥

mālā pherat jug bhayā, phirā na man kā pherkar kā man kā ḍār deṁ, man kā manakā pher

माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो।

Ages spent turning prayer beads, and the mind never turned. Drop the beads, turn the mind.

गायन परंपरा से

रेखांकित शब्द पर टैप करें, अर्थ दिखेगा

WhatsApp

शब्दार्थ

माला
जप की माला (rosary)
जुग
युग (an age)
फेर
चक्कर, बदलाव (turning)
मनका
माला का दाना (bead)

यह दोहा कहाँ मिलता है

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ

विषय: सच और दिखावा।

एक पंक्ति रोज़ अपने साथ रखें

एक हफ़्ते तक रोज़ एक पंक्ति, आपकी बात के लिए, ईमेल पर।

मेरा हफ़्ता भेजें

लोग अक्सर पूछते हैं

"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर" का अर्थ क्या है?

माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो।

यह दोहा किस संग्रह में है?

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। कबीर के दोहे सदियों तक गाए गए, इसलिए शब्दों में थोड़ा फ़र्क मिल सकता है।

What does this doha mean in English?

Ages spent turning prayer beads, and the mind never turned. Drop the beads, turn the mind.

स्रोत और तरीका

पाठ: Kabir Dohavali (Kavitakosh compilation)। अर्थ और शब्दार्थ Wisdom के अपने हैं।

गायन परंपरा से