"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।
फेरतभया,फिरानमनका।करकामनकाडारदें,मनका॥
mālā pherat jug bhayā, phirā na man kā pherkar kā man kā ḍār deṁ, man kā manakā pher
माला फेरते युग बीत गया, मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़ो, मन के मनके फेरो।
Ages spent turning prayer beads, and the mind never turned. Drop the beads, turn the mind.
गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ
विषय: सच और दिखावा।
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