गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट: अर्थ सहित
"गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा। भीतर हाथ से सहारा देता है, बाहर से चोट करके कमियाँ निकालता है। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।
गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ
विषय: गुरु पर दोहे।
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