गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट: अर्थ सहित

"गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट" कबीर का दोहा है। इसका अर्थ है: गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा। भीतर हाथ से सहारा देता है, बाहर से चोट करके कमियाँ निकालता है। यह दोहा गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह में मिलता है।

गुरु कुम्हार है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै ।अन्तर हाथ सहार दै, बाहर चोट॥

guru kumhār siṣ kuṁbh hai, gaṛhi-gaṛhi kāṛhai khoṭantar hāth sahār dai, bāhar bāhai coṭ

गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा। भीतर हाथ से सहारा देता है, बाहर से चोट करके कमियाँ निकालता है।

The guru is a potter, the student a pot. One hand supports from inside while the other taps out flaws.

गायन परंपरा से

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शब्दार्थ

सिष
शिष्य (student)
कुंभ
घड़ा (pot)
गढ़ि
गढ़कर, बनाकर (shaping)
खोट
कमी (flaw)
बाहै
मारे (strikes)

यह दोहा कहाँ मिलता है

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। यह दोहा कबीर ग्रंथावली या कविता-कौमुदी में इस रूप में नहीं मिला, पर लोक और भजन गायकी में कबीर के नाम से गाया जाता है। स्रोत पाठ

विषय: गुरु पर दोहे।

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लोग अक्सर पूछते हैं

"गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट" का अर्थ क्या है?

गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा। भीतर हाथ से सहारा देता है, बाहर से चोट करके कमियाँ निकालता है।

यह दोहा किस संग्रह में है?

गायन परंपरा और लोकप्रिय संग्रह। कबीर के दोहे सदियों तक गाए गए, इसलिए शब्दों में थोड़ा फ़र्क मिल सकता है।

What does this doha mean in English?

The guru is a potter, the student a pot. One hand supports from inside while the other taps out flaws.

स्रोत और तरीका

पाठ: Kabir Dohavali (Kavitakosh compilation)। अर्थ और शब्दार्थ Wisdom के अपने हैं।

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