भगवद् गीता में कुरुक्षेत्र
कुरुक्षेत्र वह युद्धभूमि है जहाँ गीता कही गई; पहले ही श्लोक में इसे धर्मक्षेत्र कहा गया है।
कर्तव्य का क्षेत्र। वह भूमि जहाँ गीता कही गई। ये वे श्लोक हैं जो पूरे संवाद को उसके स्थान में बाँधते हैं।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥
- 1.4अ. 1
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़ेबड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़ेबड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं ।
- 1.5अ. 1
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़ेबड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़ेबड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं ।
- 1.6अ. 1
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़ेबड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़ेबड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं ।
- 1.7अ. 1
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
हे द्विजोत्तम हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उनपर भी आप ध्यान दीजिये ।
- 1.8अ. 1
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा ॥
- 1.9अ. 1
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
इनके अतिरिक्त बहुतसे शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिये अपने जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के शस्त्रअस्त्रों को…
- 1.10अ. 1
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
वह हमारी सेना पाण्डवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है क्योंकि उसके संरक्षक उभयपक्षपाती भीष्म हैं ।
- 1.11अ. 1
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
आप सबकेसब लोग सभी मोर्चों पर अपनीअपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए ही पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें ॥
- 1.12अ. 1
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया ॥
- 1.13अ. 1
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
उसके बाद शंख, भेरी नगाड़े, ढोल, मृदङ्ग और नरसिंघे बाजे एक साथ बज उठे । उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ ॥
- 1.14अ. 1
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान् रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया ॥
- 1.15अ. 1
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।
अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक तथा धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भयानक कर्म करनेवाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक…
- 1.16अ. 1
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ॥
- 1.17अ. 1
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र…
- 1.18अ. 1
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र…
- 1.19अ. 1
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
पाण्डवसेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पनेवाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिये…
- 1.20अ. 1
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को…
- 1.21अ. 1
अर्जुन उवाचहृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों…
- 1.22अ. 1
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों…
- 1.23अ. 1
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख…
- 1.24अ. 1
संजय उवाचएवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
संजय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह…
- 1.25अ. 1
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
संजय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह…
- 1.26अ. 1
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान् ।
उसके बाद पृथानन्दन अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित पिताओंको, पितामहोंको, आचार्योंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा…
- 1.27अ. 1
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
अपनीअपनी जगह पर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवों को देखकर वे कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरता से युक्त होकर विषाद करते हुए ये वचन बोले ॥
- 1.28अ. 1
अर्जुन उवाचकृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे…
- 1.29अ. 1
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे…
- 1.30अ. 1
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे…
- 1.31अ. 1
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
हे केशव मैं लक्षणों शकुनों को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय लाभ भी नहीं देख रहा हूँ ॥
- 1.32अ. 1
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
हे कृष्ण मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुखों को ही चाहता हूँ ।
- 1.33अ. 1
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं ॥
- 1.34अ. 1
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना…
- 1.35अ. 1
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना…
- 1.36अ. 1
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
हे जनार्दन इन धृतराष्ट्रसम्बन्धियों को मारकर हमलोगों को क्या प्रसन्नता होगी इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा ॥
- 1.37अ. 1
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
इसलिये अपने बान्धव इन धृतराष्ट्रसम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं क्योंकि हे माधव अपने कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे…
- 1.39अ. 1
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेकविचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से…
- 1.44अ. 1
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
हे जनार्दन जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वापस होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं ॥
- 1.46अ. 1
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
अगर ये हाथों में शस्त्रअस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करनेवाले तथा शस्त्ररहित मुझ को मार भी दें, तो वह…
- 1.47अ. 1
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
संजय बोले ऐसा कहकर शोकाकुल मनवाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथके मध्यभाग में बैठ गये ॥
- 2.1अ. 2
सञ्जय उवाचतं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
संजय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही…
- 2.2अ. 2
श्री भगवानुवाचकुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली…
- 2.3अ. 2
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है ।
- 2.4अ. 2
अर्जुन उवाचकथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं ॥
- 2.5अ. 2
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ ।
- 2.6अ. 2
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
हम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना इन दोनोंमेंसे कौनसा अत्यन्त श्रेष्ठ है और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें…
- 2.7अ. 2
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावःपृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
कायरतारूपदोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये…
- 2.8अ. 2
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और शत्रुरहितराज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो…
- 2.9अ. 2
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
संजय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा साफसाफ कहकर चुप…