भगवद् गीता में विश्वरूप
विश्वरूप वह विराट रूप है जो कृष्ण अध्याय 11 में अर्जुन को दिखाते हैं, जिसमें सभी लोक, प्राणी और काल समाए हैं।
गीता के 50 श्लोक जो विश्वरूप पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
- 11.3अ. 11
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
हे पुरुषोत्तम आप अपनेआपको जैसा कहते हैं, यह वास्तवमें ऐसा ही है । हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ ॥
- 11.4अ. 11
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा…
- 11.5अ. 11
श्री भगवानुवाचपश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन अब मेरे अनेक तरहके, अनेक अनेक वर्णों और आकृतियोंवाले सैकड़ोंहजारों दिव्यरूपोंको तू देख ॥
- 11.7अ. 11
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को अभी देख ले ।
- 11.8अ. 11
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
परन्तु तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वरसम्बन्धी…
- 11.9अ. 11
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
सञ्जय बोले हे राजन् ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको परम ऐश्वररूप दिखाया ॥
- 11.10अ. 11
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं, हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें…
- 11.12अ. 11
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
अगर आकाशमें एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ, तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्माविराट् रूप परमात्मा के प्रकाशके समान शायद ही हो ॥
- 11.13अ. 11
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान् के उस शरीरमें एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् को देखा ॥
- 11.14अ. 11
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
भगवान् के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया ।
- 11.15अ. 11
अर्जुन उवाचपश्यामि देवांस्तव देव देहेसर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
अर्जुन बोले हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवताओंको, प्राणियोंके विशेषविशेष समुदायोंको कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको, शङ्करजीको,…
- 11.16अ. 11
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
हे विश्वरूप हे विश्वेश्वरव आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ ।
- 11.17अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं चतेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम् ।
मैं आपको किरीट, गदा, चक्र तथा शङ्ख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ ।
- 11.18अ. 11
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर अक्षरब्रह्म हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन…
- 11.19अ. 11
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
आपको मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और…
- 11.22अ. 11
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्िवनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और…
- 11.23अ. 11
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
हे महाबाहो आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले, बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब…
- 11.24अ. 11
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.26अ. 11
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राःसर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं ।
- 11.27अ. 11
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्तिदंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं ।
- 11.28अ. 11
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाःसमुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति ।
जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर…
- 11.29अ. 11
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके…
- 11.30अ. 11
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे…
- 11.31अ. 11
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो । आप प्रसन्न होइये ।
- 11.32अ. 11
श्री भगवानुवाचकालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
श्रीभगवान् बोले मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ ।
- 11.33अ. 11
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्वजित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो ।
- 11.34अ. 11
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं चकर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो । तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो ।
- 11.35अ. 11
सञ्जय उवाचएतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
सञ्जय बोले भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होकर फिर प्रणाम करके गद्गदं…
- 11.36अ. 11
अर्जुन उवाचस्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्याजगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
अर्जुन बोले हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुरागप्रेम को प्राप्त हो रहा है ।
- 11.37अ. 11
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास…
- 11.38अ. 11
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं । आप ही सबको जाननेवाले, जाननेयोग्य और परमधाम हैं ।
- 11.39अ. 11
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कःप्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह ब्रह्माजीके भी पिता हैं ।
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 11.41अ. 11
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.42अ. 11
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसिविहारशय्यासनभोजनेषु ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे भी हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.43अ. 11
पितासि लोकस्य चराचरस्यत्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं ।
- 11.44अ. 11
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ ।
- 11.45अ. 11
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वाभयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा । इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथहीसाथ भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है ।
- 11.46अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
मैं आपको वैसे ही किरीटधारी, गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ ।
- 11.47अ. 11
श्री भगवानुवाचमया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको…
- 11.49अ. 11
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये ।
- 11.50अ. 11
सञ्जय उवाचइत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वास्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
सञ्जय बोले वासुदेवभगवान् ने अर्जुनसे ऐसा कहकर फिर उसी प्रकारसे अपना रूप देवरूप दिखाया और महात्मा श्रीकृष्णने पुनः सौम्यवपु द्विभुजरूप होकर…
- 11.51अ. 11
अर्जुन उवाचदृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन ।
अर्जुन बोले हे जनार्दन आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ ॥
- 11.52अ. 11
श्री भगवानुवाचसुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
श्रीभगवान् बोले मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं । इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं ॥
- 11.54अ. 11
भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन ।
परन्तु हे शत्रुतापन अर्जुन इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें, सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ ॥
- 18.77अ. 18
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ ॥