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विषय · 50 श्लोक

भगवद् गीता में विश्वरूप

विश्वरूप वह विराट रूप है जो कृष्ण अध्याय 11 में अर्जुन को दिखाते हैं, जिसमें सभी लोक, प्राणी और काल समाए हैं।

गीता के 50 श्लोक जो विश्वरूप पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 10.12
अर्जुन उवाचपरं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं । आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु व्यापक हैं ऐसा सबकेसब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं ॥
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भगवद् गीता 11.1
अर्जुन उवाचमदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मतत्तव जाननेका वचन कहा, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है ॥
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भगवद् गीता 11.2
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
हिन्दी अर्थ
हे कमलनयन सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है ॥
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