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विषय · 51 श्लोक

भगवद् गीता में वैराग्य

वैराग्य इन्द्रियों के विषयों की लालसा से मुक्ति है; गीता इसे अभ्यास के साथ मन को वश में करने का उपाय बताती है।

वैराग्य उदासीनता नहीं — स्थिरता है। पूरी तरह कर्म करना और शांत हृदय से छोड़ देना। यही गीता की औषधि है।

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भगवद् गीता 1.32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
हिन्दी अर्थ
हे कृष्ण मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुखों को ही चाहता हूँ । हे गोविन्द हमलोगों को राज्य से क्या लाभ भोगों से क्या लाभ अथवा जीने से भी क्या लाभ ॥
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भगवद् गीता 2.43
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
हिन्दी अर्थ
हे पृथानन्दन जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है ॥
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भगवद् गीता 2.45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥
हिन्दी अर्थ
वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं हे अर्जुन तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा ॥
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