भगवद् गीता में Vairagya
वैराग्य उदासीनता नहीं — स्थिरता है। पूरी तरह कर्म करना और शांत हृदय से छोड़ देना। यही गीता की औषधि है।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥
- 2.51अ. 2
Freedom comes when action is done without clutching its reward.
समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥
- 2.52अ. 2
Clear seeing ends the pull of future pleasures.
जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा
- 2.59अ. 2
Craving ends only when a higher reality becomes more compelling.
निराहारी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता । परन्तु इस स
- 2.62अ. 2
What you dwell on becomes what you cling to, then what burns you.
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पै
- 2.69अ. 2
What the many pursue in sleep, the wise leave behind awake.
सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात परमात्मासे विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं भोग और सं
- 2.70अ. 2
Peace belongs to the one who stays steady while desire moves.
जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित
- 2.71अ. 2
Peace begins when wanting, owning, and self-importance fall away.
जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता ह
- 3.18अ. 3
Freedom ends the need to profit from action.
उस कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है, और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रह
- 3.28अ. 3
Seeing action as nature's movement ends attachment.
हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक
- 3.30अ. 3
Action becomes free when you stop claiming its results.
तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मक
- 4.10अ. 4
Purified minds reach what fear and craving cannot.
राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुतसे भक्त मेरे भाव स्वर
- 4.22अ. 4
Equal-minded action leaves no hook for bondage.
जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत त
- 4.41अ. 4
Freedom begins when action no longer leaves a hook.
हे धनञ्जय योग समता के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका
- 5.3अ. 5
Freedom comes when craving and resistance no longer steer the mind.
हे महाबाहो जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है वह कर्मयोगी सदा संन्यासी समझनेयोग्य है क्योंक
- 5.9अ. 5
Action happens; ownership is the illusion.
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता हुआ
- 5.10अ. 5
Action without attachment leaves no stain.
जो भक्तियोगी सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापस
- 5.13अ. 5
Freedom begins when action no longer feels personally owned.
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्
- 5.21अ. 5
Freedom begins when outer contact stops controlling inner joy.
बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है, उसको प्राप्त होता है । फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थ
- 5.22अ. 5
Passing pleasure loses its power when its ending is seen.
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग सुख हैं, वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण है
- 5.24अ. 5
Inner fulfillment makes freedom possible right now.
जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्
- 5.28अ. 5
Freedom begins where desire, fear, and anger lose authority.
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान
- 6.2अ. 6
Yoga begins when the mind stops clutching its own agenda.
हे अर्जुन लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं ह
- 6.4अ. 6
Yoga begins when neither pleasure nor action can hook you.
जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ क
- 6.8अ. 6
True mastery makes gold and dust feel identical.
जिसका अन्तःकरण ज्ञानविज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें
- 6.18अ. 6
Yoga begins when craving loses its grip and the mind comes home.
वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस
- 6.22अ. 6
True fulfillment leaves nothing more to chase and nothing strong enough to unsettle you.
जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भ
- 6.23अ. 6
Yoga is the breaking of suffering’s grip, practiced steadily.
जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको योग नामसे जानना चाहिये । वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है, उस ध्यानयोगका अभ्य
- 6.24अ. 6
Desire loses power when the mind stops feeding it.
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रियसमूहको सभी ओरसे हटाकर ॥
- 6.35अ. 6
A restless mind is not a verdict; it is a training ground.
श्रीभगवान् बोले हे महाबाहो यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है ।
- 6.36अ. 6
Yoga becomes reachable when the mind is trained, not merely hoped for.
जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है । परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्र
- 8.11अ. 8
The imperishable is reached by giving up desire, not by feeding it.
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य
- 9.21अ. 9
What is won by wanting is lost by time.
वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं । इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सका
- 12.11अ. 12
Let go of the result; the action itself is the practice.
अगर मेरे योगसमता के आश्रित हुआ तू इसपूर्वश्लोकमें कहे गये साधन को भी करनेमें असमर्थ है, तो मनइन्द्रियोंको वशमें करके सम्
- 12.12अ. 12
Peace begins when you stop clinging to what your action produces.
अभ्याससे शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है । कर्
- 12.17अ. 12
Devotion becomes steady when liking and disliking no longer rule the heart.
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभअशुभ कर्मोंमें रागद्वेषका त्यागी है, व
- 13.9अ. 13
Freedom begins when desire stops dressing suffering as reward.
इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको
- 13.10अ. 13
Clinging fades; the mind stays level.
आसक्तिरहित होना पुत्र, स्त्री, घर आदिमें एकात्मता घनिष्ठ सम्बन्ध न होना और अनुकूलताप्रतिकूलताकी प्राप्तिमें चित्तका नित्
- 14.21अ. 14
Real freedom must be visible, livable, and learnable.
अर्जुन बोले हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों
- 14.22अ. 14
Freedom begins when changing states stop controlling your response.
श्रीभगवान् बोले हे पाण्डव प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्व
- 15.2अ. 15
Craving and action keep the world-tree growing in every direction.
उस संसारवृक्षकी गुणोंसत्त्व, रज और तम के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली
- 15.3अ. 15
What traps you has no fixed form; detachment cuts it cleanly.
इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ विचार करनेपर मिलता नहीं क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थ
- 15.5अ. 15
Freedom begins when pride, craving, and inner division fall away.
जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए
- 18.10अ. 18
Freedom means neither resisting the hard nor craving the pleasant.
जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थ
- 18.11अ. 18
Freedom begins when action continues and attachment stops.
कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है । इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी ह
- 18.51अ. 18
Purified resolve cuts the pull of craving and aversion.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक
- 18.52अ. 18
Freedom grows from deliberate simplicity and steady restraint.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक
- 18.53अ. 18
Peace begins when the sense of ownership ends.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक