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विषय · 55 श्लोक

भगवद् गीता में कर्मयोग

कर्मयोग कर्म का मार्ग है: अपना काम पूरी लगन से करना और उसके फल की आसक्ति छोड़ देना।

गीता के 55 श्लोक जो कर्मयोग पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 2.39
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
हिन्दी अर्थ
हे पार्थ यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर देगा ॥
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भगवद् गीता 2.40
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान जन्ममरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है ॥
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भगवद् गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
हिन्दी अर्थ
कर्तव्यकर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं । अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ॥
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