भगवद् गीता में कर्मयोग
कर्मयोग कर्म का मार्ग है: अपना काम पूरी लगन से करना और उसके फल की आसक्ति छोड़ देना।
गीता के 55 श्लोक जो कर्मयोग पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
- 2.48अ. 2
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ॥
- 2.50अ. 2
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
बुद्धिसमता से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है ।
- 2.71अ. 2
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है ॥
- 3.3अ. 3
श्री भगवानुवाचलोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ।
- 3.5अ. 3
न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म…
- 3.6अ. 3
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
जो कर्मेन्द्रियों सम्पूर्ण इन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य…
- 3.7अ. 3
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
हे अर्जुन जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर निष्काम भावसे समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही…
- 3.8अ. 3
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीरनिर्वाह भी…
- 3.9अ. 3
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
यज्ञ कर्तव्यपालन के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र अपने लिये किये जानेवाले कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये…
- 3.11अ. 3
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजामनुष्य आदि की रचना करके उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे कहा कि तुमलोग इस…
- 3.12अ. 3
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
यज्ञसे भावित पुष्ट हुए देवता भी तुमलोगोंको बिना माँगे ही कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे ।
- 3.15अ. 3
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे होती है । वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है ।
- 3.16अ. 3
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
हे पार्थ जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु…
- 3.17अ. 3
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
जो मनुष्य अपनेआपमें ही रमण करनेवाला और अपनेआपमें ही तृप्त तथा अपनेआपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है ॥
- 3.18अ. 3
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
उस कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है, और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है, तथा सम्पूर्ण…
- 3.19अ. 3
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है…
- 3.20अ. 3
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।
- 3.22अ. 3
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
हे पार्थ मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ ॥
- 3.23अ. 3
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं ।
- 3.24अ. 3
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं ।
- 3.27अ. 3
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है ॥
- 3.28अ. 3
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ॥
- 3.29अ. 3
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं ।
- 3.30अ. 3
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर ॥
- 3.32अ. 3
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोषदृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही…
- 3.33अ. 3
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ॥
- 3.34अ. 3
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर स्थित हैं ।
- 3.41अ. 3
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही…
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 4.15अ. 4
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही उन्हींकी तरह कर ॥
- 4.21अ. 4
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल…
- 4.22अ. 4
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और…
- 4.25अ. 4
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन…
- 4.26अ. 4
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें…
- 4.27अ. 4
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
अन्य योगीलोग सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्रियाओंको और प्राणोंकी क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं ॥
- 4.28अ. 4
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं, और दूसरे कितने ही…
- 4.30अ. 4
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य…
- 4.31अ. 4
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ।
- 5.2अ. 5
श्री भगवानुवाचसंन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
श्रीभगवान् बोले संन्यास सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं ।
- 5.4अ. 5
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके…
- 5.5अ. 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है ।
- 5.10अ. 5
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
जो भक्तियोगी सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता ॥
- 5.11अ. 5
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल ममतारहित इन्द्रियाँशरीरमनबुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं ॥
- 5.12अ. 5
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है । परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है ॥
- 11.33अ. 11
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्वजित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो ।
- 17.11अ. 17
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यज्ञ करना कर्तव्य है इस तरह मनको समाधान करके फलेच्छारहित मनुष्योंद्वारा जो शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक है ॥
- 18.5अ. 18
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको…