भगवद् गीता में अर्जुन
अर्जुन पाण्डव योद्धा हैं जिनके युद्धभूमि पर उठे संशय से गीता शुरू होती है; प्रश्न वे पूछते हैं, उत्तर कृष्ण देते हैं।
अर्जुन के प्रश्न हम सबके प्रश्न हैं। संशय, विषाद, उलझन। ये वे श्लोक हैं जहाँ अर्जुन बोलते हैं।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥
- 1.23अ. 1
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख…
- 1.24अ. 1
संजय उवाचएवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
संजय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह…
- 1.26अ. 1
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान् ।
उसके बाद पृथानन्दन अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित पिताओंको, पितामहोंको, आचार्योंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा…
- 1.30अ. 1
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
अर्जुन बोले हे कृष्ण युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्बसमुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे…
- 1.47अ. 1
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
संजय बोले ऐसा कहकर शोकाकुल मनवाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथके मध्यभाग में बैठ गये ॥
- 2.1अ. 2
सञ्जय उवाचतं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
संजय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही…
- 2.2अ. 2
श्री भगवानुवाचकुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली…
- 2.3अ. 2
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है ।
- 2.4अ. 2
अर्जुन उवाचकथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं ॥
- 2.9अ. 2
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
संजय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा साफसाफ कहकर चुप…
- 2.10अ. 2
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश यह आगे कहे जानेवाले वचन…
- 2.35अ. 2
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
महारथीलोग तुझे भयके कारण युद्धसे उपरत हटा हुआ मानेंगे । जिनकी धारणामें तू बहुमान्य हो चुका है, उनकी दृष्टिमें तू लघुताको प्राप्त हो जायगा ॥
- 3.8अ. 3
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीरनिर्वाह भी…
- 4.4अ. 4
अर्जुन उवाचअपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
अर्जुन बोले आपका जन्म तो अभीका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यसे यह योग कहा था यह बात मैं कैसे समझूँ ॥
- 4.5अ. 4
श्री भगवानुवाचबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता ॥
- 5.1अ. 5
अर्जुन उवाचसंन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
अर्जुन बोले हे कृष्ण आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं ।
- 10.18अ. 10
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
हे जनार्दन आप अपने योग सामर्थ्य को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥
- 11.1अ. 11
अर्जुन उवाचमदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
अर्जुन बोले केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मतत्तव जाननेका वचन कहा, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है ॥
- 11.3अ. 11
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
हे पुरुषोत्तम आप अपनेआपको जैसा कहते हैं, यह वास्तवमें ऐसा ही है । हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ ॥
- 11.4अ. 11
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा…
- 11.7अ. 11
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को अभी देख ले ।
- 11.13अ. 11
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान् के उस शरीरमें एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् को देखा ॥
- 11.14अ. 11
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
भगवान् के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया ।
- 11.15अ. 11
अर्जुन उवाचपश्यामि देवांस्तव देव देहेसर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
अर्जुन बोले हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवताओंको, प्राणियोंके विशेषविशेष समुदायोंको कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको, शङ्करजीको,…
- 11.16अ. 11
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
हे विश्वरूप हे विश्वेश्वरव आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ ।
- 11.19अ. 11
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
आपको मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और…
- 11.20अ. 11
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं ।
- 11.21अ. 11
अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्तिकेचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
वे ही देवताओंके समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं । उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं ।
- 11.22अ. 11
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्िवनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और…
- 11.23अ. 11
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
हे महाबाहो आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले, बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब…
- 11.24अ. 11
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.26अ. 11
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राःसर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं ।
- 11.28अ. 11
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाःसमुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति ।
जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर…
- 11.29अ. 11
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके…
- 11.30अ. 11
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे…
- 11.31अ. 11
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो । आप प्रसन्न होइये ।
- 11.32अ. 11
श्री भगवानुवाचकालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
श्रीभगवान् बोले मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ ।
- 11.34अ. 11
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं चकर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो । तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो ।
- 11.35अ. 11
सञ्जय उवाचएतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
सञ्जय बोले भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होकर फिर प्रणाम करके गद्गदं…
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 11.46अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
मैं आपको वैसे ही किरीटधारी, गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ ।
- 11.47अ. 11
श्री भगवानुवाचमया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको…
- 11.49अ. 11
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये ।
- 11.51अ. 11
अर्जुन उवाचदृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन ।
अर्जुन बोले हे जनार्दन आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ ॥
- 11.52अ. 11
श्री भगवानुवाचसुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
श्रीभगवान् बोले मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं । इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं ॥
- 12.8अ. 12
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
तू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा इसमें संशय नहीं है ॥