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विषय · 52 श्लोक

भगवद् गीता में अर्जुन

अर्जुन पाण्डव योद्धा हैं जिनके युद्धभूमि पर उठे संशय से गीता शुरू होती है; प्रश्न वे पूछते हैं, उत्तर कृष्ण देते हैं।

अर्जुन के प्रश्न हम सबके प्रश्न हैं। संशय, विषाद, उलझन। ये वे श्लोक हैं जहाँ अर्जुन बोलते हैं।

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भगवद् गीता 1.20
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हिन्दी अर्थ
हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले ॥
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भगवद् गीता 1.21
अर्जुन उवाचहृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किनकिन के साथ युद्ध करना योग्य है ॥
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भगवद् गीता 1.22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किनकिनके साथ युद्ध करना योग्य है ॥
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