भगवद् गीता में मन
मन (मनस्) विचार और इच्छा का चंचल स्थान है; कृष्ण कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
मन को वश में करना वायु से भी कठिन है। मनस् चंचल विचार का स्थान है — और गीता की सबसे व्यावहारिक शिक्षा है इसे स्थिर करना।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
- 2.60अ. 2
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
हे कुन्तीनन्दन रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं ॥
- 2.62अ. 2
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है ।
- 2.65अ. 2
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को…
- 2.66अ. 2
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी…
- 2.67अ. 2
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी…
- 3.6अ. 3
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
जो कर्मेन्द्रियों सम्पूर्ण इन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य…
- 3.7अ. 3
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
हे अर्जुन जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर निष्काम भावसे समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही…
- 3.40अ. 3
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको…
- 3.42अ. 3
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 5.28अ. 5
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके…
- 6.2अ. 6
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
हे अर्जुन लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं हो सकता ॥
- 6.5अ. 6
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥
- 6.6अ. 6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
जिसने अपनेआपसे अपनेआपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपनेआपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें…
- 6.10अ. 6
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें…
- 6.12अ. 6
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे ॥
- 6.15अ. 6
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।
नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है ॥
- 6.18अ. 6
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है…
- 6.23अ. 6
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको योग नामसे जानना चाहिये ।
- 6.24अ. 6
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रियसमूहको सभी ओरसे हटाकर ॥
- 6.25अ. 6
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरेधीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मनबुद्धि को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न…
- 6.26अ. 6
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँजहाँ विचरण करता है, वहाँवहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये ॥
- 6.27अ. 6
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्तनिर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम सात्त्विक सुख…
- 6.28अ. 6
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।
इस प्रकार अपनेआपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है ॥
- 6.33अ. 6
अर्जुन उवाचयोऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
अर्जुन बोले हे मधुसूदन आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ ॥
- 6.34अ. 6
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
क्योंकि हे कृष्ण मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ जिद्दी और बलवान् है । उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ ॥
- 6.35अ. 6
श्री भगवानुवाचअसंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं ।
श्रीभगवान् बोले हे महाबाहो यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है ।
- 6.36अ. 6
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है ।
- 7.4अ. 7
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है ।
- 8.6अ. 8
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन मनुष्य अन्तकाल में जिसजिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस अन्तकालके भावसे सदा भावित होता हुआ उसउसको ही…
- 8.8अ. 8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
हे पृथानन्दन अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उसीको प्राप्त…
- 10.22अ. 10
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ ॥
- 12.2अ. 12
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
मेरेमें मनको लगाकर नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं ॥
- 12.7अ. 12
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
हे पार्थ मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसारसमुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ ॥
- 12.8अ. 12
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
तू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा इसमें संशय नहीं है ॥
- 12.9अ. 12
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर अर्पण करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर ॥
- 12.14अ. 12
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र प्रेमी और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर…
- 13.6अ. 13
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस…
- 15.7अ. 15
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है अपना मान लेता है ॥
- 15.8अ. 15
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित…
- 15.9अ. 15
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है ॥
- 16.21अ. 16
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये ॥
- 17.16अ. 17
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि इस तरह यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥
- 18.33अ. 18
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है ॥
- 18.53अ. 18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन…
- 18.65अ. 18
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर ।