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विषय · 49 श्लोक

भगवद् गीता में मन

मन (मनस्) विचार और इच्छा का चंचल स्थान है; कृष्ण कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

मन को वश में करना वायु से भी कठिन है। मनस् चंचल विचार का स्थान है — और गीता की सबसे व्यावहारिक शिक्षा है इसे स्थिर करना।

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भगवद् गीता 2.44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
हिन्दी अर्थ
उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती ॥
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भगवद् गीता 2.53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
हिन्दी अर्थ
जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा ॥
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भगवद् गीता 2.55
श्री भगवानुवाचप्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपनेआपसे अपनेआपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है ॥
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