40 श्लोक, हर एक मूल संस्कृत के साथ। अक्टूबर 2026 में अपडेट।

श्री कृष्ण के अनमोल वचन

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पॉज़िटिव सुविचारभरोसा

सबसे ज़्यादा खोजे जाने वाले वचन

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalahetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||

कर्म करना तुम्हारे हाथ में है, फल कभी नहीं। फल की चाह से कर्म न करो, न अकर्म से मोह।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.47

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सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

sarvadharmān parityajya mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja | ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||

बाकी सब सहारे छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सारे पापों से छुड़ा दूँगा, शोक मत करो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 18.66

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न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato 'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||

आत्मा न कभी जन्म लेता है, न मरता है। वह अजन्मा और सनातन है, शरीर मरने पर भी नहीं मरता।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.20

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आज कौन सा श्लोक आपके लिए है?

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tadātmānaṃ sṛjāmy aham ||

जब जब धर्म घटता है और अधर्म बढ़ता है, तब तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 4.7

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उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||

खुद को खुद ऊपर उठाओ, कभी नीचे मत गिराओ। तुम ही अपने मित्र हो, तुम ही अपने शत्रु।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.5

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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām | dharmasaṃsthāpanārthāya saṃbhavāmi yuge yuge ||

सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में आता हूँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 4.8

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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ | na cainaṃ kledayanty āpo na śoṣayati mārutaḥ ||

आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता, हवा सुखा नहीं सकती।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.23

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अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmy aham ||

जो सिर्फ मुझे याद करते हैं और हमेशा मुझमें लगे रहते हैं, उनकी ज़रूरतें और रक्षा मैं खुद संभालता हूँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.22

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कृष्ण स्टेटस के लिए छोटे वचन

इनका अर्थ एक लाइन में आ जाता है। व्हाट्सऐप स्टेटस या इंस्टाग्राम बायो में सीधे लगाइए।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||

स्थिर बुद्धि वाला पुण्य पाप दोनों छोड़ देता है। इसलिए योग अपनाओ, कर्म में कुशलता ही योग है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.50

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योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||

लगाव छोड़कर, योग में टिककर कर्म करो। सफलता और असफलता में एक जैसे रहो, यही समता योग है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.48

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क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati | kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||

वह जल्दी धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शांति पाता है। पक्का जान लो, मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.31

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पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

pārtha naiveha nāmutra vināśas tasya vidyate | na hi kalyāṇakṛt kaścid durgatiṃ tāta gacchati ||

ऐसे इंसान का न यहाँ नाश होता है, न परलोक में। भला करने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.40

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पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati | tad ahaṃ bhaktyupahṛtam aśnāmi prayatātmanaḥ ||

पत्ता, फूल, फल या थोड़ा जल, जो भी प्रेम से दे, उस शुद्ध मन की भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.26

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श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः

śraddhāmayo 'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ

इंसान अपनी श्रद्धा से बना है। जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 17.3

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मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

mattaḥ parataraṃ nānyat kiñcid asti dhanañjaya | mayi sarvam idaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva ||

मुझसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यह सब मुझमें ऐसे पिरोया है, जैसे धागे में मोती।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 7.7

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जब सब कुछ भारी लगे

जब अर्जुन दुख में रथ पर बैठ गया, तब कृष्ण ने यह कहा।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

mātrāsparśās tu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ | āgamāpāyino 'nityās tāṃs titikṣasva bhārata ||

सर्दी गर्मी, सुख दुःख इंद्रियों से आते जाते हैं। ये टिकते नहीं, इन्हें धीरज से सह लो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.14

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अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

aśocyān anvaśocas tvaṃ prajñāvādāṃś ca bhāṣase | gatāsūn agatāsūṃś ca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||

जिनका शोक नहीं करना चाहिए, उनका शोक करते हो, बातें ज्ञानी जैसी। ज्ञानी मरे जीते का शोक नहीं करते।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.11

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सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau | tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpam avāpsyasi ||

सुख दुःख, लाभ हानि, जीत हार को एक समान मानकर लड़ो। ऐसे तुम्हें पाप नहीं लगेगा।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.38

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जब फिर से शुरुआत करनी हो

गिरने के बाद की सुबह के लिए, जब उठना ही पड़ता है।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayy upapadyate | kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ||

इस कायरता में मत पड़ो, पार्थ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। दिल की इस छोटी कमज़ोरी को छोड़कर उठो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.3

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नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

nehābhikramanāśo 'sti pratyavāyo na vidyate | svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||

यहाँ कोई कोशिश बेकार नहीं जाती, उल्टा असर नहीं होता। थोड़ा सा भी यह धर्म बड़े डर से बचाता है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.40

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बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanas tu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||

जीता हुआ मन तुम्हारा दोस्त है। बेकाबू मन दुश्मन की तरह बर्ताव करता है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.6

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जब नतीजे का डर सताए

काम पूरे मन से करें, और नतीजे की पकड़ ढीली छोड़ें।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hy akarmaṇaḥ | śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyed akarmaṇaḥ ||

अपना तय कर्म करो, कर्म न करने से कर्म करना बेहतर है। बिना कर्म के तो शरीर भी नहीं चलता।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 3.8

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तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

tasmād asaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara | asakto hy ācaran karma param āpnoti pūruṣaḥ ||

इसलिए बिना लगाव के हमेशा अपना कर्तव्य करते रहो। बिना लगाव के कर्म करने वाला परम को पाता है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 3.19

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सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

sahajaṃ karma kaunteya sadoṣam api na tyajet | sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnir ivāvṛtāḥ ||

अपने स्वभाव से मिला कर्म, कमियों के साथ भी, मत छोड़ो। हर काम में दोष है, जैसे आग में धुआँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 18.48

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यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ | sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ||

बड़े लोग जो करते हैं, बाकी लोग वही करते हैं। वे जो मिसाल रखते हैं, दुनिया उसी पर चलती है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 3.21

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जब मन शांत न हो

उस बेचैन मन के लिए, जिसकी शिकायत ख़ुद अर्जुन ने की थी।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam | abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||

बेशक मन चंचल है और काबू करना मुश्किल है। पर अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आता है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.35

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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram | tatas tato niyamyaitad ātmany eva vaśaṃ nayet ||

चंचल और अस्थिर मन जहाँ जहाँ भटके, वहाँ वहाँ से उसे लौटाकर आत्मा में टिकाओ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.26

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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

dhyāyato viṣayān puṃsaḥ saṅgas teṣūpajāyate | saṅgāt saṃjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate ||

किसी चीज़ के बारे में सोचते रहो तो लगाव होता है, लगाव से चाह, और चाह अटकने पर गुस्सा।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.62

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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

āpūryamāṇam acalapratiṣṭhaṃ samudram āpaḥ praviśanti yadvat | tadvat kāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntim āpnoti na kāmakāmī ||

जैसे भरा समुद्र नदियों से नहीं हिलता, इच्छाओं से न हिलने वाला शांति पाता है, उनके पीछे भागने वाला नहीं।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.70

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जब सब कृष्ण पर छोड़ना हो

अपने भक्त से कृष्ण के वादे।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

yat karoṣi yad aśnāsi yaj juhoṣi dadāsi yat | yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣva madarpaṇam ||

जो भी करो, खाओ, हवन करो, दान दो या तप करो, उसे मुझे अर्पण कर दो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.27

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तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥

tam eva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata | tatprasādāt parāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam ||

पूरे मन से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम्हें परम शांति और सनातन धाम मिलेगा।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 18.62

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समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥

samo 'haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo 'sti na priyaḥ | ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpy aham ||

मैं सबके लिए समान हूँ, न कोई दुश्मन न कोई खास। प्रेम से भजने वाले मुझमें हैं, मैं उनमें।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.29

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यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ | harṣāmarṣabhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||

जो न किसी को परेशान करे, न खुद परेशान हो, हर्ष, जलन, डर, घबराहट से मुक्त, वह मुझे प्रिय है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 12.15

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जब कोई अपना चला जाए

मृत्यु पर कृष्ण के वचन, उस इंसान से जो अपने ही परिवार को खोने वाला था।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro 'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṃyāti navāni dehī ||

जैसे इंसान पुराने कपड़े छोड़कर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया ले लेता है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.22

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जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṃ janma mṛtasya ca | tasmād aparihārye 'rthe na tvaṃ śocitum arhasi ||

जो जन्मा उसकी मृत्यु तय है, और जो मरा उसका जन्म। जो टल नहीं सकता, उस पर शोक न करो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.27

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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

dehino 'smin yathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā | tathā dehāntaraprāptir dhīras tatra na muhyati ||

जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही नया शरीर मिलता है। समझदार इससे नहीं घबराते।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.13

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कृष्ण किसे प्रिय कहते हैं

कैसा इंसान कृष्ण को प्रिय है, और कौन सी तीन चीज़ें वे छोड़ने को कहते हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanam ātmanaḥ | kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṃ tyajet ||

काम, क्रोध और लोभ, ये नरक के तीन दरवाज़े हैं जो इंसान को बर्बाद करते हैं। इसलिए तीनों छोड़ दो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 16.21

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अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca | nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||

किसी से बैर नहीं, सबसे मित्रता और दया, ममता और अहंकार से मुक्त, सुख दुःख में सम, क्षमाशील।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 12.13

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अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat | svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate ||

जो बात सच्ची, प्यारी और भली हो, किसी को परेशान न करे, नियम से स्वाध्याय, यही वाणी का तप है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 17.15

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जो पंक्तियाँ कृष्ण ने कभी नहीं कहीं

गीता में नहीं है

जो हुआ, अच्छा हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा होगा।

असल में कहां से आया: मशहूर 'गीता सार' पोस्टर से, जो एक आधुनिक हिंदी सारांश है और घरों, दुकानों में टँगा मिलता है। गीता के 700 श्लोकों में यह पंक्ति नहीं है।

गीता में असल में क्या है

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

aśocyān anvaśocas tvaṃ prajñāvādāṃś ca bhāṣase | gatāsūn agatāsūṃś ca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||

जिनका शोक नहीं करना चाहिए, उनका शोक करते हो, बातें ज्ञानी जैसी। ज्ञानी मरे जीते का शोक नहीं करते।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.11

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2.11 में कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी न जीते हुओं का शोक करते हैं, न मरे हुओं का। हर घटना को अच्छा कहने की बात वहाँ नहीं है।

गीता में नहीं है

खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाओगे। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था।

असल में कहां से आया: यह भी 'गीता सार' पोस्टर से है और अक्सर कृष्ण के वचन कहकर शेयर होता है। किसी श्लोक में यह नहीं है।

गीता में असल में क्या है

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata | avyaktanidhanāny eva tatra kā paridevanā ||

हर प्राणी जन्म से पहले अदृश्य, बीच में दिखता, और मृत्यु के बाद फिर अदृश्य है। तो शोक कैसा?

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.28

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2.28 कहता है कि सब प्राणी जन्म से पहले दिखते नहीं, बीच में दिखते हैं और मौत के बाद फिर नहीं दिखते, तो शोक किस बात का। धन दौलत की बात इसमें नहीं है।

गीता में नहीं है

परिवर्तन संसार का नियम है।

असल में कहां से आया: 'गीता सार' पोस्टर की पंक्ति, जो बिना अध्याय या श्लोक नंबर के गीता के नाम से खूब पोस्ट होती है।

गीता में असल में क्या है

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

mātrāsparśās tu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ | āgamāpāyino 'nityās tāṃs titikṣasva bhārata ||

सर्दी गर्मी, सुख दुःख इंद्रियों से आते जाते हैं। ये टिकते नहीं, इन्हें धीरज से सह लो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.14

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2.14 सर्दी गर्मी और सुख दुख के आने जाने की बात करता है और अर्जुन से उन्हें धीरज से सहने को कहता है। बदलाव के किसी नियम का ज़िक्र नहीं है।

गीता में नहीं है

क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होता है, न मरता है।

असल में कहां से आया: 'गीता सार' पोस्टर की शुरुआती पंक्तियाँ। आख़िरी वाक्य 2.20 से मिलता है, पर उससे पहले के सवाल गीता में नहीं हैं।

गीता में असल में क्या है

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato 'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||

आत्मा न कभी जन्म लेता है, न मरता है। वह अजन्मा और सनातन है, शरीर मरने पर भी नहीं मरता।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.20

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2.20 आत्मा को अजन्मा, अमर और सनातन बताता है। चिंता या डर के बारे में कोई सवाल इसमें नहीं है।

गीता में नहीं है

हम जैसा सोचते हैं, वैसे बन जाते हैं।

असल में कहां से आया: आम तौर पर बुद्ध के नाम से, धम्मपद के पहले श्लोक के ढीले आधुनिक अनुवाद के रूप में। कुछ पोस्ट इसे गीता 6.5 बताती हैं।

गीता में असल में क्या है

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः

śraddhāmayo 'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ

इंसान अपनी श्रद्धा से बना है। जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 17.3

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17.3 कहता है कि इंसान अपनी श्रद्धा जैसा होता है। बात श्रद्धा की है, हर आते जाते विचार की नहीं।

गीता में नहीं है

हमें लक्ष्य से रुकावटें नहीं रोकतीं, किसी छोटे लक्ष्य का साफ़ रास्ता रोकता है।

असल में कहां से आया: अमेरिकी लेखक रॉबर्ट ब्रॉल्ट की लिखी पंक्ति, जो ऑनलाइन गीता की सीख कहकर शेयर होती है।

गीता में असल में क्या है

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalahetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||

कर्म करना तुम्हारे हाथ में है, फल कभी नहीं। फल की चाह से कर्म न करो, न अकर्म से मोह।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.47

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2.47 कहता है कि तुम्हारा हक़ कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। लक्ष्य या रुकावटों की बात इसमें नहीं है।

गीता में नहीं है

योग स्वयं की, स्वयं के द्वारा, स्वयं तक की यात्रा है।

असल में कहां से आया: योग साइटों पर गीता के श्लोक के रूप में शेयर होती है, पर गीता का कोई अध्याय या श्लोक इससे मेल नहीं खाता। हो सकता है यह 6.20 के 'आत्मा से आत्मा को' वाले भाव से ली गई हो।

गीता में असल में क्या है

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

uddhared ātmanātmānaṃ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||

खुद को खुद ऊपर उठाओ, कभी नीचे मत गिराओ। तुम ही अपने मित्र हो, तुम ही अपने शत्रु।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 6.5

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6.5 कहता है कि अपने आप को अपने ही बल से ऊपर उठाओ, खुद को गिरने मत दो, क्योंकि तुम ही अपने दोस्त हो और तुम ही अपने दुश्मन।

गीता में नहीं है

योग, खुद जैसा होने के नतीजों को सहने का अभ्यास है।

असल में कहां से आया: आम तौर पर अमेरिकी योग शिक्षक दीनबंधु सार्ली के नाम से, और अक्सर गीता की सीख कहकर शेयर होती है।

गीता में असल में क्या है

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||

लगाव छोड़कर, योग में टिककर कर्म करो। सफलता और असफलता में एक जैसे रहो, यही समता योग है।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 2.48

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2.48 योग को सफलता और असफलता में मन के एक जैसा रहने को कहता है, जब तुम अपना काम करते हो। खुद को सहने की बात इसमें नहीं है।

गीता में नहीं है

कृष्ण पर भरोसा रखो, उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ बेहतर सोच रखा है।

असल में कहां से आया: सोशल मीडिया का आधुनिक कैप्शन, जो अक्सर कृष्ण की तस्वीर के साथ पोस्ट होता है। कोई श्लोक इससे मेल नहीं खाता।

गीता में असल में क्या है

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

ananyāś cintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate | teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmy aham ||

जो सिर्फ मुझे याद करते हैं और हमेशा मुझमें लगे रहते हैं, उनकी ज़रूरतें और रक्षा मैं खुद संभालता हूँ।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 9.22

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9.22 में कृष्ण कहते हैं कि जो उन्हें एक मन से याद करते हैं, उनकी कमी वे पूरी करते हैं और जो है उसकी रक्षा करते हैं। किसी बेहतर योजना का वादा नहीं है।

गीता में नहीं है

राधा ने कृष्ण से पूछा, तुमने मुझसे शादी क्यों नहीं की? कृष्ण बोले, शादी के लिए दो लोग चाहिए, हम तो एक हैं।

असल में कहां से आया: हिंदी और अंग्रेज़ी पोस्ट में खूब शेयर होने वाला आधुनिक कैप्शन। राधा बाद की भक्ति कविता, जैसे जयदेव के गीत गोविंद, से आती हैं। गीता में राधा का नाम नहीं है।

गीता में असल में क्या है

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥

manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru | mām evaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo 'si me ||

मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, पूजा और प्रणाम करो। तुम मुझे पाओगे, यह वचन है, तुम मुझे प्रिय हो।

श्रीकृष्ण, अर्जुन से · भगवद गीता 18.65

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18.65 में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, तुम मुझे प्रिय हो।

हर सुबह कृष्ण का एक वचन

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असली कृष्ण वचन कैसे पहचानें

अर्जुन को दिया गया कृष्ण का उपदेश भगवद गीता है, जिसमें 700 श्लोक हैं और हर श्लोक की अपनी संख्या है। इसलिए हर असली कृष्ण वचन का एक पता होता है: अध्याय और श्लोक, जैसे 2.47 या 18.66।

सोशल मीडिया पर कृष्ण के नाम से चलने वाली कई पंक्तियों का कोई पता नहीं होता। वे पोस्टर और टीवी सीरियल से आती हैं। राधा के नाम वाली पंक्तियाँ भी गीता में नहीं हैं, क्योंकि गीता में राधा का ज़िक्र ही नहीं है।

इस पेज के हर वचन के साथ संस्कृत श्लोक और उसकी संख्या है। पूरा श्लोक खोलकर आप ख़ुद पढ़ सकते हैं।

ये वचन कहाँ कहे गए

कुरुक्षेत्र का मैदान, आमने सामने एक ही परिवार की दो सेनाएँ। अर्जुन अपने गुरुओं और भाइयों को सामने देखकर धनुष रख देता है और रथ में बैठ जाता है (1.47)।

रथ कृष्ण चला रहे हैं। इसके बाद जो बातचीत होती है, वही गीता है: अर्जुन पूछता है, कृष्ण जवाब देते हैं। कोई भी वचन पढ़ें तो याद रखें, यह एक ऐसे इंसान से कहा गया था जो आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

लोग अक्सर पूछते हैं

श्री कृष्ण का सबसे प्रसिद्ध वचन कौन सा है?

गीता 2.47, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन: तुम्हारा अधिकार सिर्फ़ कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इसके बाद सबसे ज़्यादा खोजे जाते हैं 4.7, यदा यदा हि धर्मस्य, और 18.66, सर्वधर्मान्परित्यज्य।

क्या गीता में राधा का ज़िक्र है?

नहीं। भगवद गीता में राधा का नाम एक बार भी नहीं आता। राधा का वर्णन बाद के भक्ति ग्रंथों में मिलता है, जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण और जयदेव का गीत गोविंद, इसलिए "राधा से कृष्ण ने कहा" वाली पंक्तियाँ गीता की नहीं हैं।

क्या कृष्ण ने कहा था "जो हुआ अच्छा हुआ"?

गीता के किसी श्लोक में यह बात नहीं है। यह पंक्ति "गीता सार" वाले पोस्टर से आती है, जो हिंदी में लिखा एक आधुनिक सार है। इसके सबसे क़रीब असली श्लोक 2.11 है, जहाँ कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी न जीते हुओं का शोक करते हैं, न मरे हुओं का।

कृष्ण स्टेटस के लिए कौन सा वचन अच्छा है?

छोटे वचन सबसे अच्छे लगते हैं: 2.50, योगः कर्मसु कौशलम्, 9.31, न मे भक्तः प्रणश्यति, या 2.48, समत्वं योग उच्यते। ऊपर स्टेटस वाले हिस्से में हर वचन श्लोक संख्या के साथ कॉपी होता है।

असली कृष्ण वचन कैसे पहचानें?

श्लोक संख्या पूछिए। अर्जुन को दिया गया कृष्ण का उपदेश भगवद गीता है, जिसके 700 श्लोक गिने हुए हैं, इसलिए हर असली वचन के साथ 2.47 या 9.22 जैसी संख्या और संस्कृत मूल होता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते का मतलब क्या है?

गीता 2.47 में कृष्ण कहते हैं: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। फल को काम की वजह मत बनाओ, और काम न करने से भी मत चिपको।