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विषय · 47 श्लोक

भगवद् गीता में त्रिगुण

गुण प्रकृति के तीन गुण हैं, सत्त्व, रजस् और तमस्; गीता के अनुसार हर मन, कर्म और वस्तु इन्हीं से बनती है।

गीता के 47 श्लोक जो त्रिगुण पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 3.5
न हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
हिन्दी अर्थ
कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं ॥
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भगवद् गीता 3.27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है ॥
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भगवद् गीता 3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
हिन्दी अर्थ
हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ॥
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