भगवद् गीता में त्रिगुण
गुण प्रकृति के तीन गुण हैं, सत्त्व, रजस् और तमस्; गीता के अनुसार हर मन, कर्म और वस्तु इन्हीं से बनती है।
गीता के 47 श्लोक जो त्रिगुण पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
- 3.29अ. 3
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं ।
- 3.33अ. 3
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ॥
- 7.12अ. 7
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
और तो क्या कहूँ जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझ से ही होते हैं ऐसा समझो । पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं ॥
- 13.15अ. 13
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका…
- 13.20अ. 13
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो ।
- 13.22अ. 13
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है ॥
- 13.24अ. 13
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह ।
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता ॥
- 14.5अ. 14
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
हे महाबाहो प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं ॥
- 14.6अ. 14
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल स्वच्छ होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे देहीको बाँधता है ॥
- 14.7अ. 14
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है ॥
- 14.9अ. 14
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर…
- 14.10अ. 14
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण…
- 14.11अ. 14
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारोंइन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश स्वच्छता और ज्ञान विवेक प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा…
- 14.12अ. 14
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं ॥
- 14.13अ. 14
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं ॥
- 14.14अ. 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है ॥
- 14.15अ. 14
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा है ॥
- 14.17अ. 14
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 14.18अ. 14
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित…
- 14.19अ. 14
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
जब विवेकी विचारकुशल मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त…
- 14.20अ. 14
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
देहधारी विवेकी मनुष्य देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव…
- 14.21अ. 14
अर्जुन उवाचकैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
अर्जुन बोले हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे…
- 14.22अ. 14
श्री भगवानुवाचप्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
श्रीभगवान् बोले हे पाण्डव प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता, और ये…
- 14.23अ. 14
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित…
- 14.24अ. 14
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी…
- 14.25अ. 14
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी…
- 14.26अ. 14
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते ।
जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ॥
- 15.2अ. 15
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
उस संसारवृक्षकी गुणोंसत्त्व, रज और तम के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं ।
- 15.10अ. 15
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते,…
- 17.2अ. 17
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो ॥
- 17.8अ. 17
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ानेवाले, स्थिर रहनेवाले, हृदयको शक्ति देनेवाले, रसयुक्त तथा चिकने ऐसे आहार अर्थात् भोजन…
- 17.10अ. 17
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 18.19अ. 18
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
गुणसंख्यान गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीनतीन…
- 18.21अ. 18
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो…
- 18.22अ. 18
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
किंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है ॥
- 18.27अ. 18
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.28अ. 18
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठअकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.29अ. 18
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।
हे धनञ्जय अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलगअलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं ॥
- 18.32अ. 18
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है ॥
- 18.35अ. 18
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
हे पार्थ दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है ॥
- 18.36अ. 18
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो ।
- 18.38अ. 18
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है ॥
- 18.39अ. 18
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है ॥