विषय · 43 श्लोक
भगवद् गीता में Vibhuti
भगवद् गीता के 43 श्लोक जो vibhuti पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 7.7हे धनञ्जय मेरे बढ़कर इस जगत् का दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है । जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह स
- 7.8हे कुन्तीनन्दन जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा प्रकाश मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव ओंकार मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्य
- 7.9पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ ॥
- 7.10हे पृथानन्दन सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान । बुद्धिमानोंमें बुद्धि और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ ॥
- 9.6जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो ॥
- 9.17क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ । जाननेयोग्
- 9.19हे अर्जुन संसारके हितके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ । और तो क्या कहूँ अमृ
- 10.1श्रीभगवान् बोले हे महाबाहो अर्जुन मेरे परम वचनको तुम फिर भी सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हितकी कामनासे कहूँगा क्योंकि तुम मेरेमें अत्यन्त प्रेम
- 10.2मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ ॥
- 10.4बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक प्
- 10.5बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक प्
- 10.6सात महर्षि और उनसे भी पूर्वमें होनेवाले चार सनकादि तथा चौदह मनु ये सबकेसब मेरे मनसे पैदा हुए हैं और मेरेमें भाव श्रद्धाभक्ति रखनेवाले हैं,
- 10.7जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है इसमें कुछ भी संशय
- 10.8मैं संसारमात्रका प्रभव मूलकारण हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धाप
- 10.16जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥
- 10.17हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात्
- 10.18हे जनार्दन आप अपने योग सामर्थ्य को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥
- 10.19श्रीभगवान् बोले हाँ, ठीक है । मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके वि
- 10.20हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हू
- 10.21मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु वामन और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ । मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ ॥
- 10.22मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ ॥
- 10.23रुद्रोंमें शंकर और यक्षराक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ । वसुओंमें पावक अग्नि और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु मैं हूँ ॥
- 10.24हे पार्थ पुरोहितोंमें मुख्य बृहस्पतिको मेरा स्वरूप समझो । सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र मैं हूँ ॥
- 10.25महर्षियोंमें भृगु और वाणियोंशब्दों में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ । सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ ॥
- 10.26सम्पूर्ण वृक्षोंमें पीपल, देवर्षियोंमें नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि मैं हूँ ॥
- 10.27घोड़ोंमें अमृतके साथ समुद्रसे प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको, श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूत
- 10.28आयुधोंमें वज्र और धेनुओंमें कामधेनु मैं हूँ । सन्तानउत्पत्तिका हेतु कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ ॥
- 10.29नागोंमें अनन्त शेषनाग और जलजन्तुओंका अधिपति वरुण मैं हूँ । पितरोंमें अर्यमा और शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ ॥
- 10.30दैत्योंमें प्रह्लाद और गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ । पशुओंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ ॥
- 10.31पवित्र करनेवालोंमें वायु और शास्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ । जलजन्तुओंमें मगर मैं हूँ । बहनेवाले स्त्रोतोंमें गङ्गाजी मैं हूँ ॥
- 10.32हे अर्जुन सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ । विद्याओंमें अध्यात्मविद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंकातत्त्वनिर्णयके
- 10.33अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ । अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ ॥
- 10.34सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्रीजातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ ॥
- 10.35गायी जानेवाली श्रुतियोंमें बृहत्साम और वैदिक छन्दोंमें गायत्री छन्द मैं हूँ । बारह महीनोंमें मार्गशीर्ष और छः ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥
- 10.36छल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ । जीतनेवालोंकी विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं ह
- 10.37वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ । मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें कवि शुक्राचार्य भी मैं हूँ ॥
- 10.38दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ । गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ ॥
- 10.39हे अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ क्योंकि मेरे बिना कोई भी चरअचर प्राणी नहीं है अर्थात् चरअचर सब कुछ मैं ही हूँ ॥
- 10.40हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेपसे कहा है
- 10.41जोजो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उसउसको तुम मेरे ही तेजयोग के अंशसे उत्पन्न हुई समझो ॥
- 10.42अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 15.12सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान ॥
- 15.13मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियोंवनस्पतियों को पुष्