भगवद् गीता में विभूति
विभूति का अर्थ है दिव्य ऐश्वर्य; अध्याय 10 में कृष्ण हर वर्ग की श्रेष्ठ वस्तु को अपनी विभूति बताते हैं।
गीता के 43 श्लोक जो विभूति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
- 7.10अ. 7
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
हे पृथानन्दन सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान । बुद्धिमानोंमें बुद्धि और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ ॥
- 9.6अ. 9
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो ॥
- 9.17अ. 9
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ ।
- 9.19अ. 9
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
हे अर्जुन संसारके हितके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ ।
- 10.1अ. 10
श्री भगवानुवाचभूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
श्रीभगवान् बोले हे महाबाहो अर्जुन मेरे परम वचनको तुम फिर भी सुनो, जिसे मैं तुम्हारे हितकी कामनासे कहूँगा क्योंकि तुम मेरेमें अत्यन्त प्रेम…
- 10.2अ. 10
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ ॥
- 10.4अ. 10
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक…
- 10.5अ. 10
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक…
- 10.6अ. 10
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
सात महर्षि और उनसे भी पूर्वमें होनेवाले चार सनकादि तथा चौदह मनु ये सबकेसब मेरे मनसे पैदा हुए हैं और मेरेमें भाव श्रद्धाभक्ति रखनेवाले हैं,…
- 10.7अ. 10
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है इसमें कुछ भी संशय…
- 10.8अ. 10
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मैं संसारमात्रका प्रभव मूलकारण हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही…
- 10.16अ. 10
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥
- 10.17अ. 10
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात्…
- 10.18अ. 10
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
हे जनार्दन आप अपने योग सामर्थ्य को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥
- 10.19अ. 10
श्री भगवानुवाचहन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
श्रीभगवान् बोले हाँ, ठीक है । मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके…
- 10.20अ. 10
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित…
- 10.21अ. 10
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु वामन और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ । मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ ॥
- 10.22अ. 10
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ ॥
- 10.23अ. 10
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
रुद्रोंमें शंकर और यक्षराक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ । वसुओंमें पावक अग्नि और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु मैं हूँ ॥
- 10.24अ. 10
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
हे पार्थ पुरोहितोंमें मुख्य बृहस्पतिको मेरा स्वरूप समझो । सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र मैं हूँ ॥
- 10.25अ. 10
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
महर्षियोंमें भृगु और वाणियोंशब्दों में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ । सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ ॥
- 10.26अ. 10
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
सम्पूर्ण वृक्षोंमें पीपल, देवर्षियोंमें नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि मैं हूँ ॥
- 10.27अ. 10
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
घोड़ोंमें अमृतके साथ समुद्रसे प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको, श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी…
- 10.28अ. 10
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
आयुधोंमें वज्र और धेनुओंमें कामधेनु मैं हूँ । सन्तानउत्पत्तिका हेतु कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ ॥
- 10.29अ. 10
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
नागोंमें अनन्त शेषनाग और जलजन्तुओंका अधिपति वरुण मैं हूँ । पितरोंमें अर्यमा और शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ ॥
- 10.30अ. 10
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
दैत्योंमें प्रह्लाद और गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ । पशुओंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ ॥
- 10.31अ. 10
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
पवित्र करनेवालोंमें वायु और शास्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ । जलजन्तुओंमें मगर मैं हूँ । बहनेवाले स्त्रोतोंमें गङ्गाजी मैं हूँ ॥
- 10.32अ. 10
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
हे अर्जुन सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ ।
- 10.33अ. 10
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ । अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ ॥
- 10.34अ. 10
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्रीजातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ ॥
- 10.35अ. 10
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
गायी जानेवाली श्रुतियोंमें बृहत्साम और वैदिक छन्दोंमें गायत्री छन्द मैं हूँ । बारह महीनोंमें मार्गशीर्ष और छः ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥
- 10.36अ. 10
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
छल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ । जीतनेवालोंकी विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं…
- 10.37अ. 10
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ । मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें कवि शुक्राचार्य भी मैं हूँ ॥
- 10.38अ. 10
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ । गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ ॥
- 10.39अ. 10
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
हे अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ क्योंकि मेरे बिना कोई भी चरअचर प्राणी नहीं है अर्थात् चरअचर सब कुछ मैं ही हूँ ॥
- 10.40अ. 10
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।
हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेपसे कहा है ॥
- 10.41अ. 10
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
जोजो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उसउसको तुम मेरे ही तेजयोग के अंशसे उत्पन्न हुई समझो ॥
- 10.42अ. 10
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 15.12अ. 15
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान ॥
- 15.13अ. 15
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियोंवनस्पतियों को…