विषय · 43 श्लोक

भगवद् गीता में Vibhuti

भगवद् गीता के 43 श्लोक जो vibhuti पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 7.7Speaker: Krishna
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव
अर्थ · हिन्दी
हे धनञ्जय मेरे बढ़कर इस जगत् का दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है । जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है ॥
सार
Krishna says nothing is greater than him, and the whole world is held together within him like beads on a string.
Everything is held in one sustaining reality.
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भगवद् गीता 7.8Speaker: Krishna
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु
अर्थ · हिन्दी
हे कुन्तीनन्दन जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा प्रकाश मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव ओंकार मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ ॥
सार
Krishna says he is the life and meaning present in ordinary things: taste in water, light in the sun and moon, Om in the Vedas, sound in space, and strength in people.
The sacred is already inside ordinary experience.
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भगवद् गीता 7.9Speaker: Krishna
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां तेजश्चास्मि विभावसौ
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु
अर्थ · हिन्दी
पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ ॥
सार
Krishna says he is present as the earth’s fragrance, fire’s brilliance, the life in every creature, and the discipline of seekers.
The sacred is already inside nature, vitality, and discipline.
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