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विषय · 69 श्लोक

भगवद् गीता में भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण है; गीता में कृष्ण इसे हर कर्म में माँगते हैं और भक्त को अपना प्रिय कहते हैं।

भक्ति अनुभव नहीं — जीवन है। हर कर्म, हर साँस, समर्पित। ये वे श्लोक हैं जहाँ गीता स्मरण का मार्ग सिखाती है।

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भगवद् गीता 4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
हिन्दी अर्थ
हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं ॥
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भगवद् गीता 6.30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
हिन्दी अर्थ
जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ॥
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भगवद् गीता 6.47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है ॥
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