भगवद् गीता में भक्ति
भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण है; गीता में कृष्ण इसे हर कर्म में माँगते हैं और भक्त को अपना प्रिय कहते हैं।
भक्ति अनुभव नहीं — जीवन है। हर कर्म, हर साँस, समर्पित। ये वे श्लोक हैं जहाँ गीता स्मरण का मार्ग सिखाती है।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
- 7.1अ. 7
श्री भगवानुवाचमय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन…
- 7.14अ. 7
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है ।
- 7.16अ. 7
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन…
- 7.17अ. 7
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते ।
उन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ…
- 7.18अ. 7
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
पहले कहे हुए सबकेसब भक्त बड़े उदार श्रेष्ठ भाववाले हैं । परन्तु ज्ञानी प्रेमी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है ।
- 7.21अ. 7
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
जोजो भक्त जिसजिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ ॥
- 7.23अ. 7
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला नाशवान् ही मिलता है ।
- 8.5अ. 8
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥
- 8.14अ. 8
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
हे पृथानन्दन अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्यनिरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त…
- 9.14अ. 9
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नित्य मेरेमें युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी…
- 9.15अ. 9
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे अभेदभावसे मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ…
- 9.18अ. 9
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ ।
- 9.23अ. 9
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
हे कुन्तीनन्दन जो भी भक्त मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक ॥
- 9.24अ. 9
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है ॥
- 9.25अ. 9
यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न्यान्ति पितृव्रताः ।
सकामभावसे देवताओंका पूजन करनेवाले शरीर छोड़नेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं । पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं ।
- 9.26अ. 9
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि यथासाध्य प्राप्त वस्तु को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा…
- 9.27अ. 9
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
हे कुन्तीपुत्र तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ॥
- 9.29अ. 9
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ । उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है ।
- 9.31अ. 9
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।
- 9.32अ. 9
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते…
- 9.33अ. 9
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है ।
- 9.34अ. 9
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर ।
- 10.3अ. 10
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ जानकार है और वह…
- 10.7अ. 10
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है इसमें कुछ भी संशय…
- 10.8अ. 10
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मैं संसारमात्रका प्रभव मूलकारण हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही…
- 10.9अ. 10
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
मेरेमें चित्तवाले, मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे गुण, प्रभाव आदिको जानते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्यनिरन्तर…
- 10.10अ. 10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
उन नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है ॥
- 10.11अ. 10
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप होनेपन में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट…
- 10.18अ. 10
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
हे जनार्दन आप अपने योग सामर्थ्य को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥
- 11.3अ. 11
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
हे पुरुषोत्तम आप अपनेआपको जैसा कहते हैं, यह वास्तवमें ऐसा ही है । हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ ॥
- 11.14अ. 11
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
भगवान् के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया ।
- 11.16अ. 11
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
हे विश्वरूप हे विश्वेश्वरव आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ ।
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 11.41अ. 11
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.44अ. 11
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ ।
- 11.46अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
मैं आपको वैसे ही किरीटधारी, गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ ।
- 11.48अ. 11
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
हे कुरुप्रवीर मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे, न यज्ञोंके अनुष्ठानसे, न दानसे, न उग्र तपोंसे और न मात्र…
- 11.51अ. 11
अर्जुन उवाचदृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन ।
अर्जुन बोले हे जनार्दन आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ ॥
- 11.52अ. 11
श्री भगवानुवाचसुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
श्रीभगवान् बोले मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं । इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं ॥
- 11.55अ. 11
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
हे पाण्डवन जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है, वह भक्त…
- 12.1अ. 12
अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपसगुण भगवान् की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम…
- 12.2अ. 12
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
मेरेमें मनको लगाकर नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं ॥
- 12.3अ. 12
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे…
- 12.4अ. 12
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे…
- 12.5अ. 12
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठिनतासे प्राप्त की…
- 12.6अ. 12
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं ॥