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विषय · 31 श्लोक

भगवद् गीता में ध्यान

ध्यान मन को एक लक्ष्य पर स्थिर रखने का अभ्यास है; गीता का छठा अध्याय इसका आसन, मुद्रा और विधि बताता है।

ध्यान केवल एक विधि नहीं — एक अवस्था है। गीता इस पर सटीक है: आसन कैसा हो, मन क्या करे, सफलता के लक्षण क्या हैं। और यह सबसे कठिन साधना क्यों है और सबसे आवश्यक भी।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 6.2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
हिन्दी अर्थ
हे अर्जुन लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं हो सकता ॥
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भगवद् गीता 6.3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
जो योगसमता में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्यकर्म करना कारण कहा गया है और उसी योगारूढ़ मनुष्यका शम शान्ति परमात्मप्राप्तिमें कारण कहा गया है ॥
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भगवद् गीता 6.4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ॥
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