भगवद् गीता में विराट रूप
विराट रूप अध्याय 11 में कृष्ण का वह दर्शन है जिसमें अनगिनत मुख, भुजाएँ और लोक हैं, और काल सबको निगल रहा है।
गीता के 25 श्लोक जो विराट रूप पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
- 11.11अ. 11
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं, हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें…
- 11.12अ. 11
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
अगर आकाशमें एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ, तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्माविराट् रूप परमात्मा के प्रकाशके समान शायद ही हो ॥
- 11.13अ. 11
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान् के उस शरीरमें एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् को देखा ॥
- 11.15अ. 11
अर्जुन उवाचपश्यामि देवांस्तव देव देहेसर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
अर्जुन बोले हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवताओंको, प्राणियोंके विशेषविशेष समुदायोंको कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको, शङ्करजीको,…
- 11.17अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं चतेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम् ।
मैं आपको किरीट, गदा, चक्र तथा शङ्ख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ ।
- 11.18अ. 11
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर अक्षरब्रह्म हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन…
- 11.19अ. 11
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
आपको मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और…
- 11.20अ. 11
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं ।
- 11.22अ. 11
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्िवनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और…
- 11.23अ. 11
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
हे महाबाहो आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले, बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब…
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.27अ. 11
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्तिदंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं ।
- 11.28अ. 11
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाःसमुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति ।
जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर…
- 11.29अ. 11
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके…
- 11.30अ. 11
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे…
- 11.31अ. 11
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो । आप प्रसन्न होइये ।
- 11.37अ. 11
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास…
- 11.39अ. 11
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कःप्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह ब्रह्माजीके भी पिता हैं ।
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 11.47अ. 11
श्री भगवानुवाचमया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको…
- 11.49अ. 11
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये ।
- 11.52अ. 11
श्री भगवानुवाचसुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
श्रीभगवान् बोले मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं । इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं ॥