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विषय · 31 श्लोक

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण

श्रीकृष्ण गीता के वक्ता हैं: अर्जुन के सारथी और सखा, जो स्वयं को सब प्राणियों के ईश्वर के रूप में प्रकट करते हैं।

जहाँ वक्ता का नाम लिया गया है, वे श्लोक यहाँ हैं — जहाँ कृष्ण स्वयं बोलते हैं।

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भगवद् गीता 2.1
सञ्जय उवाचतं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
हिन्दी अर्थ
संजय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये आगे कहे जानेवाले वचन बोले ॥
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भगवद् गीता 4.5
श्री भगवानुवाचबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता ॥
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भगवद् गीता 4.35
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तत्त्वज्ञान का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन जिस तत्त्वज्ञान से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा ॥
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