अध्याय 8 · अक्षर ब्रह्म का योग
अक्षर ब्रह्म योग
मृत्यु के क्षण में क्या होता है। अक्षर ब्रह्म। प्रकाश का मार्ग, धूम का मार्ग।
सभी 28 श्लोक नीचे।

श्लोक
- 8.1अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ…
- 8.2अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ…
- 8.3श्रीभगवान् बोले परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं । प्राणियों का उद्भव सत्ता को प्रकट करनेवाला जो त्य…
- 8.4हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देहमे…
- 8.5जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥
- 8.6हे कुन्तीपुत्र अर्जुन मनुष्य अन्तकाल में जिसजिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस अन्तकालके भावसे सदा भावित होता हुआ उसउसको ही प…
- 8.7इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा ॥
- 8.8हे पृथानन्दन अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उसीको प्राप्त ह…
- 8.9जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्मसेसूक्ष्म, सबका धारणपोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप ऐसे अचिन्त्य स्व…
- 8.10वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके शरीर छोड़नेपर उस परम दिव्य प…
- 8.11वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह…
- 8.12इन्द्रियोंके सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ …
- 8.13इन्द्रियोंके सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ …
- 8.14हे पृथानन्दन अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्यनिरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त…
- 8.15महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्र…
- 8.16हे अर्जुन ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती है परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता ॥
- 8.17जो मनुष्य ब्रह्माके एक हज़ार चतुर्युगीवाले एक दिनको और सहस्त्र चतुर्युगीपर्यन्त एक रातको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जाननेवाल…
- 8.18ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तम…
- 8.19हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है ॥
- 8.20परन्तु उस अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं …
- 8.21उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है ॥
- 8.22हे पृथानन्दन अर्जुन सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त…
- 8.23हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते …
- 8.24जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता, और छः महीनोंवाले उत्तरायणका अधिपति देवता है, श…
- 8.25जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उ…
- 8.26क्योंकि शुक्ल और कृष्ण ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्प्राणिमात्र के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं । इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना…
- 8.27हे पृथानन्दन इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन तू सब समयमें योगयुक्त हो जा ॥
- 8.28योगी इसको शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण …