अध्याय 7 · ज्ञान-विज्ञान का योग
ज्ञान विज्ञान योग
ईश्वर के दो रूप — व्यक्त और अव्यक्त। बिरले खोजते हैं, और भी बिरले समझते हैं।
सभी 30 श्लोक नीचे।

श्लोक
- 7.1श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सु…
- 7.2तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा ॥
- 7.3हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है ॥
- 7.4पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है । हे महाबाहो इस अपरा प्…
- 7.5पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है । हे महाबाहो इस अपरा प्…
- 7.6अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो । मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ ॥
- 7.7हे धनञ्जय मेरे बढ़कर इस जगत् का दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है । जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह स…
- 7.8हे कुन्तीनन्दन जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा प्रकाश मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव ओंकार मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्य…
- 7.9पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ ॥
- 7.10हे पृथानन्दन सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान । बुद्धिमानोंमें बुद्धि और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ ॥
- 7.11हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ । मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध धर्मयुक्त काम मैं हूँ ॥
- 7.12और तो क्या कहूँ जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझ से ही होते हैं ऐसा समझो । पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं ॥
- 7.13किन्तु इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सब जगत् इन गुणोंसे अतीत अविनाशी मुझे नहीं जानता ॥
- 7.14क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है । जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते है…
- 7.15मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले, आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पापकर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते । ९ ॥
- 7.16हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन क…
- 7.17उन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ औ…
- 7.18पहले कहे हुए सबकेसब भक्त बड़े उदार श्रेष्ठ भाववाले हैं । परन्तु ज्ञानी प्रेमी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है । कारण कि वह युक्तात्मा…
- 7.19बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें सब कुछ परमात्मा ही है, ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥
- 7.20उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर देवताओंके उनउन नियमोंको धारण करते हुए उनउन देवत…
- 7.21जोजो भक्त जिसजिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ ॥
- 7.22उस मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य सकामभावपूर्वक उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है परन्तु वह…
- 7.23परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला नाशवान् ही मिलता है । देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते …
- 7.24बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त मनइन्द्रियोंसे पर मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर ध…
- 7.25जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते मानते, उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता ॥
- 7.26हे अर्जुन जो प्राणी भूतकालमें हो चुके हैं, तथा जो वर्तमानमें हैं और जो भविष्यमें होंगे, उन सब प्राणियोंको तो मैं जानता हूँ परन्तु मेरेको को…
- 7.27हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप इच्छा राग और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्वमोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्ममरणको प्…
- 7.28परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं, वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं ॥
- 7.29जरा वृद्धावस्था और मरण मृत्यु से मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्म…
- 7.30जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं ॥