विषय · 32 श्लोक

भगवद् गीता में Yajna

यज्ञ समर्पण का कर्म है — वह अर्पण जो किसी क्रिया को उसके तात्कालिक उद्देश्य से परे ले जाता है। गीता इसे अनुष्ठान से बहुत आगे ले जाती है: ज्ञान-यज्ञ, प्राण-यज्ञ, फल की कामना का समर्पण।

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भगवद् गीता 3.9Speaker: Krishna
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर
अर्थ · हिन्दी
यज्ञ कर्तव्यपालन के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र अपने लिये किये जानेवाले कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्यकर्म कर ॥
सार
Work done only for personal gain creates bondage. Work done as an offering, without attachment, should be done instead.
Work becomes bondage when it is done for yourself.
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भगवद् गीता 3.10Speaker: Krishna
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्
अर्थ · हिन्दी
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजामनुष्य आदि की रचना करके उनसे प्रधानतया मनुष्योंसे कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो । अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ॥
सार
At the start of creation, Prajapati set up a way of living where sacrifice and duty help all beings flourish. The message is to support life through shared responsibility.
Life flourishes when duty becomes mutual support.
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भगवद् गीता 3.11Speaker: Unknown
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ
अर्थ · हिन्दी
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजामनुष्य आदि की रचना करके उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो । अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ॥
सार
Support the larger order through your actions, and that order will support you in return. Mutual support leads to the highest good.
Your duty nourishes the whole, and the whole nourishes you back.
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