भगवद् गीता में बुद्धि
बुद्धि वह शक्ति है जो विचार करके निर्णय लेती है; गीता ऐसी बुद्धि माँगती है जो स्थिर रहे और एक लक्ष्य पर टिकी रहे।
बुद्धि चतुराई नहीं — विवेक है। जो बदलते हुए के पीछे अपरिवर्तनीय को देखती है। ये श्लोक उसी से बात करते हैं।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
- 2.63अ. 2
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है ।
- 2.65अ. 2
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को…
- 2.66अ. 2
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी…
- 2.67अ. 2
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी…
- 3.39अ. 3
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
और हे कुन्तीनन्दन इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकियोंके नित्य वैरी इस कामके द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है ॥
- 3.40अ. 3
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको…
- 3.42अ. 3
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 5.20अ. 5
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य…
- 5.22अ. 5
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग सुख हैं, वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं ।
- 5.28अ. 5
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके…
- 6.21अ. 6
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी…
- 6.25अ. 6
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरेधीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मनबुद्धि को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न…
- 6.27अ. 6
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्तनिर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम सात्त्विक सुख…
- 7.4अ. 7
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है ।
- 12.8अ. 12
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
तू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा इसमें संशय नहीं है ॥
- 12.14अ. 12
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र प्रेमी और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर…
- 13.6अ. 13
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस…
- 18.21अ. 18
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो…
- 18.22अ. 18
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
किंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है ॥
- 18.29अ. 18
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।
हे धनञ्जय अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलगअलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं ॥
- 18.32अ. 18
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है ॥
- 18.51अ. 18
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन…