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विषय · 26 श्लोक

भगवद् गीता में बुद्धि

बुद्धि वह शक्ति है जो विचार करके निर्णय लेती है; गीता ऐसी बुद्धि माँगती है जो स्थिर रहे और एक लक्ष्य पर टिकी रहे।

बुद्धि चतुराई नहीं — विवेक है। जो बदलते हुए के पीछे अपरिवर्तनीय को देखती है। ये श्लोक उसी से बात करते हैं।

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भगवद् गीता 2.39
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
हिन्दी अर्थ
हे पार्थ यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर देगा ॥
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भगवद् गीता 2.52
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
हिन्दी अर्थ
जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा ॥
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भगवद् गीता 2.53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
हिन्दी अर्थ
जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा ॥
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