भगवद् गीता में Shraddha
श्रद्धा विश्वास है — किसी मत का नहीं, बल्कि वह विश्वास जो व्यक्ति के हर कर्म को आकार देता है। गीता सीधे कहती है: आप अपनी श्रद्धा से बने हैं। जो आप पर विश्वास करते हैं, वैसे ही बन जाते हैं।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
- 4.39अ. 4
Trust, discipline, and restraint make room for peace.
जो जितेन्द्रिय तथा साधनपरायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शा
- 4.40अ. 4
A divided mind loses both peace and direction.
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है । ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख
- 6.37अ. 6
Faith without completion still deserves a clear answer.
अर्जुन बोले हे कृष्ण जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो
- 6.47अ. 6
Trusting devotion is the highest integration of yoga.
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है ॥
- 7.1अ. 7
Refuge and practice open the way to complete knowing.
श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह
- 7.3अ. 7
True knowing is rarer than striving, even among the successful.
हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जान
- 7.20अ. 7
Desire clouds judgment and sends the mind toward smaller refuges.
उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर देवताओंके उनउन नियमोंको धार
- 7.21अ. 7
Faith becomes firm where the devotee turns.
जोजो भक्त जिसजिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ ॥
- 7.22अ. 7
Faith draws the result, but the deeper order grants it.
उस मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य सकामभावपूर्वक उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी
- 7.23अ. 7
Finite worship brings finite results; devotion returns you to Krishna.
परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला नाशवान् ही मिलता है । देवताओंका पूजन करनेवाले देव
- 9.3अ. 9
Without trust, the highest teaching cannot carry you beyond repetition.
हे परंतप इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्था
- 9.23अ. 9
All sincere worship reaches the one reality, even when the form is confused.
हे कुन्तीनन्दन जो भी भक्त मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अवि
- 12.2अ. 12
Full trust and steady remembrance make devotion complete.
मेरेमें मनको लगाकर नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्
- 12.9अ. 12
Practice can lead the mind where stillness cannot yet go.
अगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर अर्पण करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छ
- 12.20अ. 12
Faithful practice turns devotion into closeness.
जो मेरेमें श्रद्धा रखनेवाले और मेरे परायण हुए भक्त पहले कहे हुए इस धर्ममय अमृतका अच्छी तरहसे सेवन करते हैं, वे मुझे अत्य
- 13.26अ. 13
Devoted listening can carry a person beyond fear and mortality.
दूसरे मनुष्य इस प्रकार ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको नहीं जानते, केवल जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे सुनकर उपासना
- 17.1अ. 17
Faith alone does not reveal its quality; the motive beneath it does.
अर्जुन बोले हे कृष्ण जो मनुष्य शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौनसी
- 17.2अ. 17
Faith takes the shape of the nature beneath it.
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसक
- 17.3अ. 17
Trust is not just held; it becomes the person.
हे भारत सभी मनुष्योंकी श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप होती है । यह मनुष्य श्रद्धामय है । इसलिये जो जैसी श्रद्धावाला है, वह
- 17.4अ. 17
Faith reveals itself in what each person chooses to revere.
सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भू
- 17.10अ. 17
What you repeatedly choose to consume reveals the heaviness within.
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 17.13अ. 17
Ritual without trust becomes empty and heavy.
शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते
- 17.16अ. 17
A trained mind is its own austerity.
मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि इस तरह यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥
- 17.17अ. 17
True discipline is clean only when reward is no longer the motive.
परम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकारशरीर, वाणी और मन का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं
- 17.20अ. 17
Giving becomes pure when nothing is being bought in return.
दान देना कर्तव्य है ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा ग
- 17.21अ. 17
A gift becomes lesser the moment it starts asking for something back.
किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है
- 17.25अ. 17
Freedom deepens when action stops demanding a private return.
तत् नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अन
- 17.26अ. 17
What is real and worthy carries the mark of sat.
हे पार्थ परमात्माके सत्इस नामका सत्तामात्रमें और श्रेष्ठ भावमें प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्मके साथ सत् शब्द ज
- 17.27अ. 17
Steady offering makes ordinary action sacred.
यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति निष्ठा है, वह भी सत् ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म
- 17.28अ. 17
Trust is what makes action real; without it, effort becomes empty.
हे पार्थ अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब असत् ऐसा कहा जाता है ।
- 18.71अ. 18
Trustful listening can open the door to freedom.
श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीताग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके