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विषय · 19 श्लोक

भगवद् गीता में मोह

मोह वह भ्रम है जो सत्य और कर्तव्य को धुंधला कर देता है; आरम्भ में अर्जुन इसी में हैं और 18.73 में यह नष्ट होता है।

गीता के 19 श्लोक जो मोह पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 2.2
श्री भगवानुवाचकुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है ॥
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भगवद् गीता 2.42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
हिन्दी अर्थ
हे पृथानन्दन जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है ॥
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भगवद् गीता 2.63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
हिन्दी अर्थ
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है । क्रोध होनेपर सम्मोह मूढ़भाव हो जाता है । सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है । स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है । बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है ॥
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