भगवद् गीता में मोह
मोह वह भ्रम है जो सत्य और कर्तव्य को धुंधला कर देता है; आरम्भ में अर्जुन इसी में हैं और 18.73 में यह नष्ट होता है।
गीता के 19 श्लोक जो मोह पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
- 2.72अ. 2
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है । इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता ।
- 3.29अ. 3
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं ।
- 5.15अ. 5
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं ॥
- 7.15अ. 7
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले, आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पापकर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते । ९ ॥
- 7.25अ. 7
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते मानते, उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता ॥
- 8.27अ. 8
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
हे पृथानन्दन इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन तू सब समयमें योगयुक्त हो जा ॥
- 9.12अ. 9
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्फल देनेवाले…
- 10.3अ. 10
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ जानकार है और वह…
- 14.13अ. 14
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं ॥
- 14.17अ. 14
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 16.14अ. 16
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे । हम सर्वसमर्थ हैं । हमारे पास भोगसामग्री बहुत है । हम सिद्ध हैं ।
- 16.16अ. 16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले मनुष्य भयङ्कर…
- 16.20अ. 16
असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
हे कुन्तीनन्दन वे मूढ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्मजन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक अधम गतिमें अर्थात्…
- 18.25अ. 18
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.39अ. 18
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है ॥
- 18.72अ. 18
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
हे पृथानन्दन क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ॥