अध्याय 16 · दैवी और आसुरी संपदा का योग
दैवासुर संपद् विभाग योग
दो प्रकृतियाँ — दैवी और आसुरी। ये दूर के पात्र नहीं — हर मनुष्य के भीतर की प्रवृत्तियाँ हैं।
सभी 24 श्लोक नीचे।

श्लोक
- 16.1श्रीभगवान् बोले भयका सर्वथा अभाव अन्तःकरणकी शुद्धि ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति सात्त्विक दान इन्द्रियोंका दमन यज्ञ स्वाध्याय कर्तव्यपाल…
- 16.2अहिंसा, सत्यभाषण क्रोध न करना संसारकी कामनाका त्याग अन्तःकरणमें रागद्वेषजनित हलचलका न होना चुगली न करना प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयों…
- 16.3तेज प्रभाव, क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्ष…
- 16.4हे पृथानन्दन दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्…
- 16.5दैवीसम्पत्ति मुक्तिके लिये और आसुरीसम्पत्ति बन्धनके लिये है । हे पाण्डव तुम दैवीसम्पत्तिको प्राप्त हुए हो, इसलिये तुम्हें शोक चिन्ता नहीं क…
- 16.6इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है दैवी और आसुरी । दैवीका तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार …
- 16.7आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्यपालन ही होता है ॥
- 16.8वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपनेआप केवल स्त्रीपुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है । इसलिये काम ही इसका कारण है, और …
- 16.9उपर्युक्त नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं…
- 16.10कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धा…
- 16.11वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और जो कुछ है, वह इतना ही है …
- 16.12वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य कामक्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धनसंचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं…
- 16.13इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं और अब इस मनोरथको प्राप्त पूरा कर लेंगे । ,इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना धन फिर हो जायगा ॥
- 16.14वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे । हम सर्वसमर्थ हैं । हमारे पास भोगसामग्री बहुत है । हम सिद्ध है…
- 16.15हम धनवान् हैं, बहुतसे मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते …
- 16.16कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले मनुष्य भयङ्कर नरकों…
- 16.17अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते…
- 16.18वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा मेरे…
- 16.19उन द्वेष करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले और संसारमें महान् नीच, अपवित्र मनुष्योंको मैं बारबार आसुरी योनियोंमें गिराता ही रहता हूँ ॥
- 16.20हे कुन्तीनन्दन वे मूढ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्मजन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक अधम गतिमें अर्थात् भ…
- 16.21काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये ॥
- 16.22हे कुन्तीनन्दन इन नरकके तीनों दरवाजोंसे रहित हुआ जो मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है ॥
- 16.23जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिअन्तःकरणकी शुद्धि को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है ॥
- 16.24अतः तेरे लिये कर्तव्यअकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है ॥