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विषय · 22 श्लोक

भगवद् गीता में तप

तप वह अनुशासित साधना है जो शुद्ध करती है; गीता शरीर, वाणी और मन के तप का वर्णन करती है।

तपस् साधना है — दंड नहीं, बल्कि वह स्वैच्छिक अनुशासन जो परिष्कृत करता है। गीता तीन प्रकार बताती है: शरीर का, वाणी का, मन का। और वह तपस् भी जो साधक को परिष्कृत नहीं — नष्ट करता है।

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भगवद् गीता 4.28
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं, और दूसरे कितने ही योगयज्ञ करनेवाले हैं, तथा कितने ही स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं ॥
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भगवद् गीता 4.29
अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं । ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं ॥
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भगवद् गीता 5.29
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
हिन्दी अर्थ
भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥
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