विषय · 26 श्लोक

भगवद् गीता में Sattva

भगवद् गीता के 26 श्लोक जो sattva पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.49Speaker: Krishna
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः
अर्थ · हिन्दी
बुद्धियोगसमता की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे अत्यन्त ही निकृष्ट है । अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि समता का आश्रय ले क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं ॥
सार
Action done for rewards is lower than action guided by clear discernment. Krishna tells Arjuna to rely on that steadiness instead of craving outcomes.
Clear discernment is richer than reward-chasing.
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भगवद् गीता 2.56Speaker: Krishna
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते
अर्थ · हिन्दी
दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है ॥
सार
A truly steady person stays calm in hardship, does not chase pleasure, and is free from attachment, fear, and anger.
Steadiness remains when pleasure and pain lose their grip.
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भगवद् गीता 6.27Speaker: Krishna
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्
अर्थ · हिन्दी
जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्तनिर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम सात्त्विक सुख प्राप्त होता है ॥
सार
A person who has calmed the mind, quieted passion, and become free of inner impurity reaches the highest kind of joy.
Joy comes when the restless mind finally becomes still.
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