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विषय · 26 श्लोक

भगवद् गीता में सत्त्व

सत्त्व प्रकाश, स्पष्टता और शुद्धता का गुण है; यह ज्ञान और शांति देता है, पर गीता कहती है कि सुख की आसक्ति से यह भी बाँधता है।

गीता के 26 श्लोक जो सत्त्व पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 2.49
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धियोगसमता की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे अत्यन्त ही निकृष्ट है । अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि समता का आश्रय ले क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं ॥
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भगवद् गीता 2.56
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है ॥
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भगवद् गीता 6.27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्तनिर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम सात्त्विक सुख प्राप्त होता है ॥
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