भगवद् गीता में सत्त्व
सत्त्व प्रकाश, स्पष्टता और शुद्धता का गुण है; यह ज्ञान और शांति देता है, पर गीता कहती है कि सुख की आसक्ति से यह भी बाँधता है।
गीता के 26 श्लोक जो सत्त्व पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
- 6.28अ. 6
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।
इस प्रकार अपनेआपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है ॥
- 10.36अ. 10
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
छल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ । जीतनेवालोंकी विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं…
- 12.16अ. 12
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहरभीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नयेनये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह…
- 14.6अ. 14
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल स्वच्छ होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे देहीको बाँधता है ॥
- 14.9अ. 14
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर…
- 14.10अ. 14
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण…
- 14.11अ. 14
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारोंइन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश स्वच्छता और ज्ञान विवेक प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा…
- 14.14अ. 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है ॥
- 14.16अ. 14
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा है ॥
- 14.17अ. 14
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 14.18अ. 14
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित…
- 16.17अ. 16
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन…
- 17.2अ. 17
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो ॥
- 17.4अ. 17
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणोंका पूजन करते…
- 17.7अ. 17
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी…
- 17.11अ. 17
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यज्ञ करना कर्तव्य है इस तरह मनको समाधान करके फलेच्छारहित मनुष्योंद्वारा जो शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक है ॥
- 17.16अ. 17
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि इस तरह यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥
- 17.17अ. 17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्ित्रविधं नरैः ।
परम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकारशरीर, वाणी और मन का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं ॥
- 18.10अ. 18
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है ॥
- 18.20अ. 18
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भावसत्ता को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो ॥
- 18.23अ. 18
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक…
- 18.26अ. 18
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है ॥
- 18.38अ. 18
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है ॥