भगवद् गीता में काम
काम इच्छा या कामना है; कृष्ण इसे क्रोध के साथ रजोगुण से उत्पन्न वह शत्रु बताते हैं जो ज्ञान को ढक लेता है।
काम केवल इच्छा नहीं — वह खिंचाव है जो इन्द्रियों को विषयों की ओर ले जाता है और उस पूरी शृंखला को शुरू करता है जिसके विरुद्ध गीता चेतावनी देती है। ये वे श्लोक हैं जहाँ कृष्ण दिखाते हैं कि काम एक जीवन के साथ क्या करता है।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
- 2.70अ. 2
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही…
- 3.37अ. 3
श्री भगवानुवाचकाम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
श्रीभगवान् बोले रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है । यह बहुत खानेवाला और महापापी है । इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान ॥
- 3.38अ. 3
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान विवेक ढका हुआ है ॥
- 3.39अ. 3
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
और हे कुन्तीनन्दन इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकियोंके नित्य वैरी इस कामके द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है ॥
- 3.40अ. 3
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको…
- 3.41अ. 3
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही…
- 3.42अ. 3
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 5.23अ. 5
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
इस मनुष्यशरीरमें जो कोई मनुष्य शरीर छूटनेसे पहले ही कामक्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी…
- 5.26अ. 5
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
कामक्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसेशरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके…
- 6.24अ. 6
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रियसमूहको सभी ओरसे हटाकर ॥
- 7.20अ. 7
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर देवताओंके उनउन नियमोंको धारण करते हुए उनउन…
- 9.21अ. 9
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं ।
- 16.10अ. 16
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको…
- 16.11अ. 16
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और जो कुछ है, वह इतना ही है…
- 16.12अ. 16
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य कामक्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धनसंचय करनेकी चेष्टा करते रहते…
- 16.16अ. 16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले मनुष्य भयङ्कर…
- 16.18अ. 16
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा…
- 16.21अ. 16
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये ॥
- 16.22अ. 16
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
हे कुन्तीनन्दन इन नरकके तीनों दरवाजोंसे रहित हुआ जो मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है ॥