भगवद् गीता में समर्पण
गीता समर्पण को हर कर्म और उसका फल ईश्वर को सौंपना बताती है; कृष्ण का अंतिम आह्वान है कि केवल उनकी शरण लो।
गीता के 23 श्लोक जो समर्पण पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
- 11.19अ. 11
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
आपको मैं आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोवाले, प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और…
- 11.20अ. 11
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं ।
- 11.24अ. 11
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.31अ. 11
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो । आप प्रसन्न होइये ।
- 11.32अ. 11
श्री भगवानुवाचकालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
श्रीभगवान् बोले मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ ।
- 11.37अ. 11
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास…
- 11.40अ. 11
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्तेनमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
हे सर्व आपको आगेसे भी नमस्कार हो पीछेसे भी नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब…
- 11.43अ. 11
पितासि लोकस्य चराचरस्यत्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं ।
- 11.45अ. 11
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वाभयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा । इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथहीसाथ भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है ।
- 11.49अ. 11
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये ।
- 11.54अ. 11
भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन ।
परन्तु हे शत्रुतापन अर्जुन इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें, सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ ॥
- 12.7अ. 12
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
हे पार्थ मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसारसमुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ ॥
- 12.8अ. 12
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
तू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा इसमें संशय नहीं है ॥
- 12.11अ. 12
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
अगर मेरे योगसमता के आश्रित हुआ तू इसपूर्वश्लोकमें कहे गये साधन को भी करनेमें असमर्थ है, तो मनइन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका…
- 12.16अ. 12
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहरभीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नयेनये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह…
- 18.61अ. 18
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
हे अर्जुन ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको उनके स्वभावके अनुसार…
- 18.65अ. 18
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर ।
- 18.66अ. 18
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥
- 18.73अ. 18
अर्जुन उवाचनष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
अर्जुन बोले हे अच्युत आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है । मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ ।