भगवद् गीता में क्षेत्र
क्षेत्र का अर्थ है खेत; गीता में यह शरीर और सारा ज्ञेय जगत है, जिसे अध्याय 13 उसके ज्ञाता से अलग करता है।
गीता के 14 श्लोक जो क्षेत्र पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
- 13.3अ. 13
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ और क्षेत्रक्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतमें ज्ञान है ॥
- 13.4अ. 13
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें…
- 13.6अ. 13
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस…
- 13.7अ. 13
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः ।
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना प्राणशक्ति और धृति इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है ॥
- 13.19अ. 13
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया । मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है ॥
- 13.20अ. 13
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो ।
- 13.27अ. 13
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो ॥
- 13.30अ. 13
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपनेआपको अकर्ता देखता अनुभव करता है, वही यथार्थ देखता है ॥
- 13.34अ. 13
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करता है, ऐसे ही क्षेत्री क्षेत्रज्ञ, आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित…
- 13.35अ. 13
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरविभाग को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको…
- 14.21अ. 14
अर्जुन उवाचकैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
अर्जुन बोले हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे…