विषय · 19 श्लोक
भगवद् गीता में Indriya
भगवद् गीता के 19 श्लोक जो indriya पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.59निराहारी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता । परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका
- 2.60हे कुन्तीनन्दन रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं ॥
- 2.62विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है । क्रोध
- 2.67अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद
- 3.34इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर स्थित हैं ।
- 3.40इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको मोहि
- 3.42इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं । इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे
- 3.43इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं । इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे
- 4.26अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें ह
- 5.9तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता हुआ, श्वास लेता तथा आँख
- 5.22क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग सुख हैं, वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं । अतः विवेकशील मन
- 6.4जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ॥
- 6.21जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे
- 6.24संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रियसमूहको सभी ओरसे हटाकर ॥
- 13.6मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस तत्त्
- 13.15वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरणपोष
- 15.8जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्
- 17.10जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 18.33हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है ॥