भगवद् गीता में इन्द्रिय
इन्द्रियाँ ज्ञान और कर्म के साधन हैं; गीता चेताती है कि ये मन को खींच ले जाती हैं, इसलिए इन्हें वश में रखना चाहिए।
गीता के 19 श्लोक जो इन्द्रिय पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
- 2.67अ. 2
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी…
- 3.34अ. 3
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर स्थित हैं ।
- 3.40अ. 3
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको…
- 3.42अ. 3
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 4.26अ. 4
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें…
- 5.9अ. 5
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता हुआ, श्वास लेता तथा…
- 5.22अ. 5
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग सुख हैं, वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं ।
- 6.4अ. 6
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ॥
- 6.21अ. 6
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी…
- 6.24अ. 6
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रियसमूहको सभी ओरसे हटाकर ॥
- 13.6अ. 13
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि महत्तत्त्व, समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय यह चौबीस…
- 13.15अ. 13
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका…
- 15.8अ. 15
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित…
- 17.10अ. 17
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 18.33अ. 18
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है ॥