भगवद् गीता में Attachment
भगवद् गीता के 20 श्लोक जो attachment पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
- 2.48अ. 2
Equanimity turns action into yoga.
हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है
- 2.56अ. 2
Steadiness remains when pleasure and pain lose their grip.
दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग
- 3.9अ. 3
Work becomes bondage when it is done for yourself.
यज्ञ कर्तव्यपालन के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र अपने लिये किये जानेवाले कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मों
- 3.19अ. 3
Freedom comes when action is done without grasping at its reward.
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको
- 4.22अ. 4
Equal-minded action leaves no hook for bondage.
जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत त
- 4.23अ. 4
Action loses its grip when it becomes offering, not possession.
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म क
- 5.10अ. 5
Action without attachment leaves no stain.
जो भक्तियोगी सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापस
- 5.11अ. 5
Action becomes cleansing when attachment is removed.
कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल ममतारहित इन्द्रियाँशरीरमनबुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते ह
- 5.12अ. 5
Peace comes when action is no longer chained to reward.
कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है । परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध ज
- 12.17अ. 12
Devotion becomes steady when liking and disliking no longer rule the heart.
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभअशुभ कर्मोंमें रागद्वेषका त्यागी है, व
- 12.18अ. 12
Real devotion stays even when life feels hostile or kind.
जो शत्रु और मित्रमें तथा मानअपमानमें सम है और शीतउष्ण अनुकूलताप्रतिकूलता तथा सुखदुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और ज
- 13.22अ. 13
Attachment to changing qualities keeps the cycle of birth going.
प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण
- 16.16अ. 16
Desire scatters the mind, and confusion turns that scattering into a fall.
कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले
- 18.9अ. 18
Renunciation means doing what must be done without gripping the result.
हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग
- 18.23अ. 18
The purest action asks for nothing back.
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ
- 18.27अ. 18
Craving turns action into a chase for reward and emotional swing.
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.34अ. 18
Steadiness becomes restless when it is tied to reward.
हे पृथानन्दन अर्जुन फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम भोग और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है,