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विषय · 20 श्लोक

भगवद् गीता में आसक्ति

गीता सिखाती है कि फल की आसक्ति ही बाँधती है; आसक्ति छोड़कर किया गया वही कर्म मुक्ति की ओर ले जाता है।

गीता के 20 श्लोक जो आसक्ति पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 2.8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
हिन्दी अर्थ
पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और शत्रुरहितराज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय ऐसा मैं नहीं देखता हूँ ॥
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भगवद् गीता 2.44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
हिन्दी अर्थ
उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती ॥
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भगवद् गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
हिन्दी अर्थ
कर्तव्यकर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं । अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ॥
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