भगवद् गीता में अधर्म
अधर्म धर्म का उलटा है, सही व्यवस्था का पतन; कृष्ण कहते हैं कि जब अधर्म बढ़ता है, वे युग-युग में प्रकट होते हैं।
गीता के 12 श्लोक जो अधर्म पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥
- 1.44अ. 1
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
हे जनार्दन जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वापस होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं ॥
- 4.7अ. 4
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
हे भरतवंशी अर्जुन जबजब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तबतब ही मैं अपनेआपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ ॥
- 4.8अ. 4
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
साधुओंभक्तों की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युगयुगमें प्रकट हुआ…
- 16.8अ. 16
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपनेआप केवल स्त्रीपुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है ।
- 16.12अ. 16
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य कामक्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धनसंचय करनेकी चेष्टा करते रहते…
- 16.21अ. 16
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये ॥
- 16.23अ. 16
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिअन्तःकरणकी शुद्धि को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है ॥
- 18.31अ. 18
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥
- 18.32अ. 18
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है ॥