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विषय · 21 श्लोक

भगवद् गीता में रजस्

रजस् राग और क्रियाशीलता का गुण है; गीता के अनुसार यह तृष्णा से उपजता है और कर्म की आसक्ति से बाँधता है।

गीता के 21 श्लोक जो रजस् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 3.36
अर्जुन उवाचअथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन बोले हे वार्ष्णेय फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है ॥
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भगवद् गीता 3.37
श्री भगवानुवाचकाम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है । यह बहुत खानेवाला और महापापी है । इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान ॥
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भगवद् गीता 3.38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान विवेक ढका हुआ है ॥
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