भगवद् गीता में रजस्
रजस् राग और क्रियाशीलता का गुण है; गीता के अनुसार यह तृष्णा से उपजता है और कर्म की आसक्ति से बाँधता है।
गीता के 21 श्लोक जो रजस् पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
- 6.27अ. 6
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्तनिर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम सात्त्विक सुख…
- 14.7अ. 14
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है ॥
- 14.9अ. 14
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर…
- 14.10अ. 14
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण…
- 14.12अ. 14
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं ॥
- 14.15अ. 14
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा है ॥
- 14.17अ. 14
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 14.18अ. 14
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित…
- 17.2अ. 17
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो ॥
- 17.4अ. 17
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणोंका पूजन करते…
- 17.7अ. 17
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी…
- 17.21अ. 17
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है ॥
- 18.8अ. 18
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता ॥
- 18.21अ. 18
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो…
- 18.24अ. 18
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.27अ. 18
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.34अ. 18
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
हे पृथानन्दन अर्जुन फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम भोग और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है ॥