भगवद् गीता में निष्काम
निष्काम का अर्थ है कामना से रहित; गीता में यह वह कर्म है जो कर्तव्य मानकर, फल की इच्छा के बिना किया जाए।
फल की कामना के बिना कर्म। निष्काम कर्म गीता की सबसे कठिन और सबसे मुक्त शिक्षा है।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
- 3.9अ. 3
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
यज्ञ कर्तव्यपालन के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र अपने लिये किये जानेवाले कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये…
- 4.14अ. 4
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है ।
- 4.21अ. 4
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल…
- 5.2अ. 5
श्री भगवानुवाचसंन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
श्रीभगवान् बोले संन्यास सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं ।
- 5.12अ. 5
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है । परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है ॥
- 17.11अ. 17
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यज्ञ करना कर्तव्य है इस तरह मनको समाधान करके फलेच्छारहित मनुष्योंद्वारा जो शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक है ॥
- 17.17अ. 17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्ित्रविधं नरैः ।
परम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकारशरीर, वाणी और मन का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं ॥
- 17.25अ. 17
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
तत् नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अनेक प्रकारकी यज्ञ और…
- 18.2अ. 18
श्री भगवानुवाचकाम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
॥
- 18.9अ. 18
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है ॥
- 18.17अ. 18
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है ॥