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विषय · 20 श्लोक

भगवद् गीता में क्षेत्रज्ञ

क्षेत्रज्ञ क्षेत्र को जानने वाला है, यानी शरीर को जानने वाली चेतना; कृष्ण कहते हैं कि सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ वे ही हैं।

गीता के 20 श्लोक जो क्षेत्रज्ञ पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 13.1
अर्जुन उवाचप्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोलेहे कुन्तीपुत्र अर्जुन यहरूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ नामसे कहते हैं ॥
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भगवद् गीता 13.2
श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले हे कुन्तीपुत्र अर्जुन यह रूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ नामसे कहते हैं ॥
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भगवद् गीता 13.3
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
हिन्दी अर्थ
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ और क्षेत्रक्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतमें ज्ञान है ॥
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