भगवद् गीता में Kshetrajna
भगवद् गीता के 20 श्लोक जो kshetrajna पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
- 13.4अ. 13
Clear seeing begins by separating the field from the one who knows it.
वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, व
- 13.7अ. 13
Your reactions belong to the field, not to the knower.
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना प्राणशक्ति और धृति इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है ॥
- 13.14अ. 13
What seems separate is already filled with the supreme reality.
वे परमात्मा सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं । वे संसारमें सबको व
- 13.15अ. 13
What sustains everything is beyond the senses that perceive it.
वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्
- 13.17अ. 13
Separation is only appearance; the many are held by one.
वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं । वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर
- 13.18अ. 13
What illumines everything is already nearest to you.
वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है । वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञानसाधनसम
- 13.19अ. 13
Clear understanding becomes transformation when devotion receives it.
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया । मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है ॥
- 13.20अ. 13
Change belongs to nature; awareness is not caught in it.
प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो । कार्य और करणके द्वारा
- 13.22अ. 13
Attachment to changing qualities keeps the cycle of birth going.
प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण
- 13.23अ. 13
Identity is borrowed from the body; the true self stands beyond it.
यह पुरुष प्रकृतिशरीर के साथ सम्बन्ध रखनेसे उपद्रष्टा, उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे अनुमन्ता, अपनेको उसका भरणपोषण
- 13.25अ. 13
The same realization opens through different disciplines.
कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपनेआपसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते
- 13.27अ. 13
All forms arise from the meeting of awareness and changing nature.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे
- 13.29अ. 13
Seeing unity everywhere ends the violence that returns to yourself.
क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपनेआपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त
- 13.30अ. 13
Freedom begins when you stop claiming every action as yours.
जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपनेआपको अकर्ता देखता अनुभव करता है, वही
- 13.32अ. 13
What you are remains unstained, even while life moves through you.
हे कुन्तीनन्दन यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है । यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता
- 13.34अ. 13
Awareness illuminates everything without being touched by what it sees.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित करता है, ऐसे ही क्षेत्री क्षेत्रज्ञ, आत्मा सम्पूर्ण क्
- 13.35अ. 13
Clear seeing separates you from what changes and opens the way beyond it.
इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरविभाग को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं,