भगवद् गीता में विवेक
विवेक सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य में भेद करने की क्षमता है, जिसे कृष्ण दूसरे अध्याय से सिखाते हैं।
विवेक वह भेदबुद्धि है — सत्य को असत्य से, नित्य को अनित्य से, आत्मा को अनात्मा से पहचानने की क्षमता। इसके बिना सभी साधनाएँ अंधी हैं। ये वे श्लोक हैं जहाँ गीता इस क्षमता को प्रशिक्षित करती है।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
- 4.40अ. 4
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है । ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है ॥
- 13.1अ. 13
अर्जुन उवाचप्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
श्रीभगवान् बोलेहे कुन्तीपुत्र अर्जुन यहरूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ…
- 13.4अ. 13
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें…
- 13.12अ. 13
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
अध्यात्मज्ञानमें नित्यनिरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना यह पूर्वोक्त साधनसमुदाय तो ज्ञान है और जो इसके विपरीत है…
- 13.24अ. 13
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह ।
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता ॥
- 13.35अ. 13
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरविभाग को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको…
- 14.11अ. 14
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारोंइन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश स्वच्छता और ज्ञान विवेक प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा…
- 14.19अ. 14
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
जब विवेकी विचारकुशल मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त…
- 18.1अ. 18
अर्जुन उवाचसंन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.25अ. 18
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.30अ. 18
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
हे पृथानन्दन जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है ॥
- 18.31अ. 18
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥