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विषय · 15 श्लोक

भगवद् गीता में विवेक

विवेक सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य में भेद करने की क्षमता है, जिसे कृष्ण दूसरे अध्याय से सिखाते हैं।

विवेक वह भेदबुद्धि है — सत्य को असत्य से, नित्य को अनित्य से, आत्मा को अनात्मा से पहचानने की क्षमता। इसके बिना सभी साधनाएँ अंधी हैं। ये वे श्लोक हैं जहाँ गीता इस क्षमता को प्रशिक्षित करती है।

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भगवद् गीता 2.11
श्री भगवानुवाचअशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते ॥
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भगवद् गीता 2.69
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात परमात्मासे विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं, वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है ॥
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भगवद् गीता 3.38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान विवेक ढका हुआ है ॥
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