विषय · 15 श्लोक
भगवद् गीता में Viveka
भगवद् गीता के 15 श्लोक जो viveka पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.11श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण
- 2.69सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात परमात्मासे विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं
- 3.38जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान विवेक ढका हुआ है ॥
- 4.40विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है । ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है ॥
- 13.1श्रीभगवान् बोलेहे कुन्तीपुत्र अर्जुन यहरूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ ना
- 13.4वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरे
- 13.12अध्यात्मज्ञानमें नित्यनिरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना यह पूर्वोक्त साधनसमुदाय तो ज्ञान है और जो इसके विपरीत है
- 13.24इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता ॥
- 13.35इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरविभाग को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्
- 14.11जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारोंइन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश स्वच्छता और ज्ञान विवेक प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा
- 14.19जब विवेकी विचारकुशल मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त
- 18.1अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.25जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.30हे पृथानन्दन जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है ॥
- 18.31हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥