भगवद् गीता में सांख्य
गीता में सांख्य विवेकपूर्ण ज्ञान का मार्ग है: आत्मा को शरीर और प्रकृति से अलग समझना।
गीता के 11 श्लोक जो सांख्य पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
- 2.39अ. 2
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
हे पार्थ यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर…
- 3.3अ. 3
श्री भगवानुवाचलोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ।
- 5.4अ. 5
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके…
- 5.5अ. 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है ।
- 5.8अ. 5
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें…
- 13.25अ. 13
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपनेआपसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं ॥
- 18.13अ. 18
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ ॥
- 18.15अ. 18
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पूर्वोक्त पाँचों हेतु होते हैं ॥