विषय · 20 श्लोक
भगवद् गीता में Battlefield
कुरुक्षेत्र में स्थापित श्लोक। शंख, सेनाएँ, और प्रथम बाण से पहले की चुप्पी।
- 1.1धृतराष्ट्र बोले हे संजय धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरेे और पाण्डु के पुत्रों ने भी क्या किया ॥
- 1.4यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़ेबड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़ेबड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं । उनमें युयुधान सात्य
- 1.5यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़ेबड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़ेबड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुनके समान हैं । उनमें युयुधान सात्य
- 1.7हे द्विजोत्तम हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उनपर भी आप ध्यान दीजिये । आपको याद दिलाने के लिये मेरी सेना के जो नायक हैं, उनको मैं कहता हूँ
- 1.8आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा ॥
- 1.9इनके अतिरिक्त बहुतसे शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिये अपने जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के शस्त्रअस्त्रों को चलानेव
- 1.10वह हमारी सेना पाण्डवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है क्योंकि उसके संरक्षक उभयपक्षपाती भीष्म हैं । परन्तु इन पाण्डवों की सेना हमा
- 1.14उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान् रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया ॥
- 1.16कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ॥
- 1.18हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र
- 1.20हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यव
- 1.21अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों
- 1.22अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों
- 1.23दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख लू
- 1.24संजय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह भी
- 1.33जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं ॥
- 1.47संजय बोले ऐसा कहकर शोकाकुल मनवाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथके मध्यभाग में बैठ गये ॥
- 2.10हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश यह आगे कहे जानेवाले वचन बोले
- 2.38जयपराजय, लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ॥
- 18.59अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है क्योंकि तेरी क्षात्रप्रकृति तेरेको युद्धमें