भगवद् गीता में युद्धभूमि
ये गीता के युद्धभूमि वाले श्लोक हैं: कुरुक्षेत्र में दो सेनाएँ, शंखनाद, और वह क्षण जब अर्जुन धनुष रख देते हैं।
कुरुक्षेत्र में स्थापित श्लोक। शंख, सेनाएँ, और प्रथम बाण से पहले की चुप्पी।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥
- 1.7अ. 1
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
हे द्विजोत्तम हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उनपर भी आप ध्यान दीजिये ।
- 1.8अ. 1
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा ॥
- 1.9अ. 1
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
इनके अतिरिक्त बहुतसे शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिये अपने जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के शस्त्रअस्त्रों को…
- 1.10अ. 1
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
वह हमारी सेना पाण्डवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है क्योंकि उसके संरक्षक उभयपक्षपाती भीष्म हैं ।
- 1.14अ. 1
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
उसके बाद सफेद घोड़ों से युक्त महान् रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया ॥
- 1.16अ. 1
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ॥
- 1.18अ. 1
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
हे राजन् श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र…
- 1.20अ. 1
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को…
- 1.21अ. 1
अर्जुन उवाचहृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों…
- 1.22अ. 1
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
अर्जुन बोले हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों…
- 1.23अ. 1
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख…
- 1.24अ. 1
संजय उवाचएवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
संजय बोले हे भरतवंशी राजन् निद्राविजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह…
- 1.33अ. 1
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं ॥
- 1.47अ. 1
सञ्जय उवाचएवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
संजय बोले ऐसा कहकर शोकाकुल मनवाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथके मध्यभाग में बैठ गये ॥
- 2.10अ. 2
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश यह आगे कहे जानेवाले वचन…
- 2.38अ. 2
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
जयपराजय, लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ॥
- 18.59अ. 18
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है क्योंकि तेरी क्षात्रप्रकृति तेरेको…