विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में Tyaga

भगवद् गीता के 14 श्लोक जो tyaga पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 3.30Speaker: Krishna
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः
अर्थ · हिन्दी
तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर ॥
सार
Give every action inwardly to the divine, then do your duty without craving results, without clinging, and without inner distress.
Action becomes free when you stop claiming its results.
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 12.12Speaker: Krishna
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्
अर्थ · हिन्दी
अभ्याससे शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है । कर्मफलत्यागसे तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त हो जाती है ॥
सार
Practice, study, and meditation all help, but letting go of personal reward is even higher. That release brings immediate calm.
Peace begins when you stop clinging to what your action produces.
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 17.20Speaker: Krishna
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे
देशे काले पात्रे तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्
अर्थ · हिन्दी
दान देना कर्तव्य है ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ॥
सार
A gift is pure when it is given as a duty, to the right person, at the right time and place, without expecting anything back.
Giving becomes pure when nothing is being bought in return.
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
सभी 14 श्लोक