भगवद् गीता में Tyaga
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो tyaga पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
- 18.1अ. 18
Clear seeing begins with asking what must be separated.
अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.2अ. 18
Renunciation means releasing both craving and attachment to results.
॥
- 18.3अ. 18
Renunciation is not simple refusal; some actions must remain.
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग
- 18.4अ. 18
Renunciation is not one thing; it has distinct forms.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरु
- 18.6अ. 18
Right action is complete only when desire for reward is dropped.
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा
- 18.7अ. 18
Right action should not be abandoned just because it feels difficult.
नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है । उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है ॥
- 18.8अ. 18
Fearful withdrawal is not freedom; it is avoidance wearing a noble name.
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके
- 18.9अ. 18
Renunciation means doing what must be done without gripping the result.
हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग
- 18.10अ. 18
Freedom means neither resisting the hard nor craving the pleasant.
जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थ
- 18.11अ. 18
Freedom begins when action continues and attachment stops.
कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है । इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी ह
- 18.12अ. 18
The chain of action ends when desire for its fruit ends.
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु