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विषय · 16 श्लोक

भगवद् गीता में आत्मसंयम

गीता आत्मसंयम को अपने प्रयास से अपना उद्धार करना बताती है; वश में किया मन मित्र है और बेलगाम मन शत्रु।

गीता के 16 श्लोक जो आत्मसंयम पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।

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भगवद् गीता 2.60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
हिन्दी अर्थ
हे कुन्तीनन्दन रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं ॥
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भगवद् गीता 2.68
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिये हे महाबाहो जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत वशमें की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है ॥
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भगवद् गीता 3.33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ॥
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