भगवद् गीता में आत्मसंयम
गीता आत्मसंयम को अपने प्रयास से अपना उद्धार करना बताती है; वश में किया मन मित्र है और बेलगाम मन शत्रु।
गीता के 16 श्लोक जो आत्मसंयम पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
- 3.34अ. 3
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर स्थित हैं ।
- 3.40अ. 3
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं । यह काम इन इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको…
- 3.42अ. 3
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 3.43अ. 3
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
इन्द्रियोंको स्थूलशरीरसे पर श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म कहते हैं ।
- 4.21अ. 4
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल…
- 5.23अ. 5
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
इस मनुष्यशरीरमें जो कोई मनुष्य शरीर छूटनेसे पहले ही कामक्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी…
- 5.26अ. 5
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
कामक्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसेशरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके…
- 6.5अ. 6
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥
- 6.6अ. 6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
जिसने अपनेआपसे अपनेआपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपनेआपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें…
- 6.26अ. 6
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँजहाँ विचरण करता है, वहाँवहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये ॥
- 6.34अ. 6
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
क्योंकि हे कृष्ण मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ जिद्दी और बलवान् है । उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ ॥
- 6.35अ. 6
श्री भगवानुवाचअसंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं ।
श्रीभगवान् बोले हे महाबाहो यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है ।
- 16.21अ. 16
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये ॥