भगवद् गीता में समत्व
समत्व सफलता और असफलता में मन की समानता है; 2.48 में कृष्ण कहते हैं कि यही समत्व योग कहलाता है।
समत्व वह समभाव है — उदासीनता नहीं, बल्कि सुख और दुःख, लाभ और हानि, प्रशंसा और निंदा के प्रति एक-सी स्थिरता। गीता इसे योग कहती है। यही स्थिरता साधना का असली गंतव्य है।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
- 4.22अ. 4
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और…
- 5.19अ. 5
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही…
- 5.20अ. 5
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य…
- 6.7अ. 6
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
जिसने अपनेआपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीतउष्ण अनुकूलताप्रतिकूलता सुखदुःख तथा मानअपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं ॥
- 6.32अ. 6
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
हे अर्जुन जो ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी…
- 9.29अ. 9
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ । उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है ।
- 12.3अ. 12
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे…
- 12.4अ. 12
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे…
- 12.18अ. 12
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
जो शत्रु और मित्रमें तथा मानअपमानमें सम है और शीतउष्ण अनुकूलताप्रतिकूलता तथा सुखदुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको…
- 14.24अ. 14
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी…