विषय · 13 श्लोक
भगवद् गीता में Samatva
भगवद् गीता के 13 श्लोक जो samatva पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.38जयपराजय, लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ॥
- 2.48हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ॥
- 2.50बुद्धिसमता से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है । अतः तू योगसमता में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंम
- 4.22जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धि
- 5.19जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही
- 5.20जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्
- 6.7जिसने अपनेआपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीतउष्ण अनुकूलताप्रतिकूलता सुखदुःख तथा मानअपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं ॥
- 6.32हे अर्जुन जो ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी मान
- 9.29मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ । उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है । परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं,
- 12.3जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्
- 12.4जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्
- 12.18जो शत्रु और मित्रमें तथा मानअपमानमें सम है और शीतउष्ण अनुकूलताप्रतिकूलता तथा सुखदुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समा
- 14.24जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रियमें तथा अपनी निन्दा