अन्य भाषाRead in English
विषय · 13 श्लोक

भगवद् गीता में समत्व

समत्व सफलता और असफलता में मन की समानता है; 2.48 में कृष्ण कहते हैं कि यही समत्व योग कहलाता है।

समत्व वह समभाव है — उदासीनता नहीं, बल्कि सुख और दुःख, लाभ और हानि, प्रशंसा और निंदा के प्रति एक-सी स्थिरता। गीता इसे योग कहती है। यही स्थिरता साधना का असली गंतव्य है।

चुने हुए 3 श्लोक: पूरा पाठ और संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
हिन्दी अर्थ
जयपराजय, लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 2.48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
हिन्दी अर्थ
हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
भगवद् गीता 2.50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धिसमता से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है । अतः तू योगसमता में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है ॥
पूरा श्लोक + ऑडियो पढ़ें →
सभी 13 श्लोक