भगवद् गीता में संन्यास और त्याग
गीता के अनुसार कामना से किए कर्म छोड़ना संन्यास है, और सभी कर्मों का फल छोड़ना त्याग है।
गीता के 14 श्लोक जो संन्यास और त्याग पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम् ॥
- 5.2अ. 5
श्री भगवानुवाचसंन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
श्रीभगवान् बोले संन्यास सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं ।
- 5.4अ. 5
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके…
- 5.5अ. 5
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है ।
- 5.6अ. 5
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
परन्तु हे महाबाहो कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥
- 6.1अ. 6
श्री भगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता…
- 18.3अ. 18
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं ।
- 18.4अ. 18
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ त्याग तीन…
- 18.5अ. 18
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको…
- 18.7अ. 18
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है । उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है ॥
- 18.8अ. 18
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता ॥
- 18.12अ. 18
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग…