भगवद् गीता में विस्मय
ये श्लोक विश्वरूप देखकर अर्जुन का विस्मय दिखाते हैं: रोमांचित होकर वे प्रणाम करते हैं और सखा-भाव की भूलों की क्षमा माँगते हैं।
गीता के 13 श्लोक जो विस्मय पर हैं, सभी अध्यायों से, क्रम में।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
- 11.20अ. 11
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हिव्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं ।
- 11.22अ. 11
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्िवनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और…
- 11.23अ. 11
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
हे महाबाहो आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहुत उदरोंवाले, बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब…
- 11.24अ. 11
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।
- 11.25अ. 11
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल…
- 11.30अ. 11
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे…
- 11.35अ. 11
सञ्जय उवाचएतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
सञ्जय बोले भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होकर फिर प्रणाम करके गद्गदं…
- 11.41अ. 11
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस…
- 11.46अ. 11
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
मैं आपको वैसे ही किरीटधारी, गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ ।
- 18.77अ. 18
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ ॥